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Friday, 3 April 2026

आस्था बनाम आधुनिकता

 आस्था बनाम आधुनिकता


आस्था!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

और जो कहना चाहता हूँ

उसे मंदिरों में नहीं

लोगों के दिलों में रख देना चाहता हूँ…


आस्था!


तुम हमेशा से थी

धीरे-धीरे

दीये की लौ की तरह


और अब

आधुनिकता आ गई है

LED की तेज़ रोशनी लेकर


दोनों ही रोशनी हैं

लेकिन फर्क इतना है

कि तुम सुकून देती हो

वो दिखावा ज़्यादा करती है…


आधुनिकता!


मैं तुमसे भी कुछ कहना चाहता हूँ

तुम बुरी नहीं हो


तुमने हमें उड़ना सिखाया

दुनिया को छोटा कर दिया

सोच को खोल दिया


लेकिन कभी-कभी

तुमने दिल को

थोड़ा छोटा भी कर दिया…


आस्था!


तुम मंदिर में थी

मस्जिद में थी

गुरुद्वारे में थी


अब तुम

मोबाइल के वॉलपेपर में भी हो

और स्टेटस में भी


लेकिन पता नहीं क्यों

पहले जितनी गहरी थी

अब उतनी दिखती नहीं…


आधुनिकता!


तुमने सवाल करना सिखाया

हर चीज़ को तौलना सिखाया

“क्यों” पूछना सिखाया


और यह अच्छा है


लेकिन हर “क्यों” के बाद

अगर “विश्वास” मर जाए

तो फिर

इंसान सिर्फ मशीन रह जाता है…


आस्था!


तुम अंधी भी होती हो कभी-कभी

लोग तुम्हारे नाम पर

डर फैलाते हैं

नफ़रत फैलाते हैं


और तब

तुम आस्था नहीं रहती

सिर्फ आदत बन जाती हो…


आधुनिकता!


तुम तेज़ हो

बहुत तेज़


इतनी तेज़

कि कई बार

इंसान खुद से आगे निकल जाता है


और फिर

पीछे मुड़कर देखता है

तो पाता है

कि आत्मा कहीं छूट गई है…


आस्था!


मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता

क्योंकि तुममें

मेरा बचपन है

मेरी माँ की प्रार्थनाएँ हैं

मेरे पिता का विश्वास है…


आधुनिकता!


मैं तुम्हें भी छोड़ नहीं सकता

क्योंकि तुममें

मेरा आज है

मेरे सपने हैं

मेरी उड़ान है…


आस्था और आधुनिकता!


तुम दोनों से कहना है

लड़ो मत


एक साथ रहो

जैसे आँख और दिमाग

जैसे दिल और दिमाग


क्योंकि

आस्था बिना आधुनिकता

अंधविश्वास बन जाती है


और आधुनिकता बिना आस्था

अंदर से खाली…


आस्था बनाम आधुनिकता


यह लड़ाई नहीं है

यह संतुलन है


और शायद

सबसे बड़ा इंसान वही है

जो दोनों को साथ लेकर चलता है…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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