“‘विद्यां चाविद्यां च’ वाक्य का यथार्थ और समुच्चय-खण्डन: हेतु-स्वरूप-विरोध के आधार पर शांकर-निर्णय”
शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)
“‘विद्यां चाविद्यां च’ इति वचनात् अविरोधः (स्यात्) इति चेत्—न।
हेतुस्वरूपयोः विरोधात् विद्याविद्ययोः (न समुच्चयः)।
विरोधाविरोधयोः विकल्प-असंभवात् (तयोः समुच्चयः न युक्तः)।”
अन्वय
यदि “विद्यां च अविद्यां च” इति वचनात् अविरोधः स्यात् इति चेत्—न।
हेतु-स्वरूपयोः विरोधात् विद्याविद्ययोः समुच्चयः न (उपपद्यते)।
विरोध-अविरोधयोः विकल्पस्य असंभवात् (अपि) (समुच्चयः न युक्तः)।
सामान्य अर्थ (सरल हिन्दी)
यदि यह कहा जाए कि “विद्या और अविद्या दोनों को जानो”—इस वाक्य से उनका आपसी विरोध नहीं है, तो यह ठीक नहीं है।
क्योंकि उनके स्वरूप और कारण ही परस्पर विरोधी हैं।
और विरोध तथा अविरोध—इन दोनों में से किसी एक का ही स्वीकार हो सकता है, दोनों साथ नहीं हो सकते। इसलिए उनका समुच्चय उचित नहीं है।
यहाँ शास्त्रकार अत्यन्त सूक्ष्म रूप से उस भ्रान्ति का निराकरण करते हैं, जो “विद्यां चाविद्यां च” इति श्रुति-वाक्य के कारण उत्पन्न होती है।
पूर्वपक्ष
“‘विद्यां चाविद्यां च’ इति वचनात् अविरोधः”
पूर्वपक्षी का तर्क है—
श्रुति स्वयं कहती है—“विद्या और अविद्या दोनों को जानो”
अतः यह सिद्ध होता है कि दोनों में विरोध नहीं है
और इस प्रकार दोनों का समुच्चय सम्भव है
सिद्धान्त-उत्तर
“न”—
यहाँ एक ही शब्द से सम्पूर्ण तर्क का खण्डन किया जाता है।
“हेतुस्वरूपयोः विरोधात्”
यहाँ शंकराचार्य का मुख्य तर्क प्रस्तुत होता है—
विद्या और अविद्या के स्वरूप तथा उनके हेतु (कारण) परस्पर विरोधी हैं।
(1) स्वरूप-विरोध
अविद्या (कर्म) → कर्तृत्व, भोक्तृत्व, द्वैत
विद्या (ज्ञान) → अकर्तृत्व, साक्षित्व, अद्वैत
अतः—
एक ही साधक में एक ही समय में दोनों का पूर्णतया सह-अस्तित्व असम्भव है।
(2) हेतु-विरोध
अविद्या → अज्ञान पर आधारित
विद्या → अज्ञान-निवृत्ति
अतः—
कारण और उसका नाश—दोनों साथ नहीं रह सकते।
“विरोधाविरोधयोः विकल्प-असंभवात्”
यह अत्यन्त गूढ़ तर्क है—
कोई वस्तु एक ही समय में
विरोधी भी हो
और अविरोधी भी हो
यह तार्किक रूप से असम्भव है।
अतः—
❌ “विद्या और अविद्या विरोधी भी हैं और नहीं भी”—ऐसा मानना असंगत है।
समुच्चय का खण्डन
इन तर्कों से स्पष्ट होता है—
विद्या और अविद्या का समुच्चय मोक्ष-साधन के रूप में असम्भव है।
हाँ—
वे क्रम से (पूर्व–उत्तर) स्वीकार्य हैं—
पहले कर्म → शुद्धि
फिर ज्ञान → मोक्ष
किन्तु—
❌ एक साथ नहीं
श्रुति-वाक्य का यथार्थ अर्थ
“विद्यां चाविद्यां च” का अर्थ यह नहीं है कि—
दोनों को मिलाकर मोक्ष प्राप्त करो
बल्कि—
दोनों के स्वरूप और फल का विवेकपूर्वक ज्ञान करो
तात्त्विक विवेचन
यहाँ तीन सिद्धान्त स्पष्ट होते हैं—
1. स्वरूप-विरोध
ज्ञान और अज्ञान का सह-अस्तित्व असम्भव
2. कारण-विरोध
अविद्या और उसका नाश—दोनों एक साथ नहीं
3. तार्किक निषेध
विरोध और अविरोध का एक साथ स्वीकार असंगत
अद्वैत सिद्धान्त की प्रतिष्ठा
यह सम्पूर्ण विवेचन अद्वैत की स्थापना करता है—
जब तक अविद्या है → संसार है
जब विद्या (ज्ञान) आती है → अविद्या नष्ट
तब—
न द्वैत रहता है
न कर्म
न बन्धन
केवल—
अद्वैत ब्रह्म
यह पदांश यह सिखाता है कि—
“श्रुति-वाक्यों का अर्थ युक्ति और सन्दर्भ के अनुसार समझना चाहिए।”
अतः—
“विद्यां चाविद्यां च” का अर्थ समुच्चय नहीं
बल्कि विवेक है
और अन्ततः—
ज्ञान ही वह तत्त्व है जो अविद्या का पूर्ण नाश कर मोक्ष प्रदान करता है।
यही शांकर-वेदान्त का अचल सिद्धान्त है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
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