द्विरोध इति चेन्न । सहसंभावोपपत्तेः” — उपनिषद्-भाष्य की एक अत्यंत सूक्ष्म तर्क-रेखा को प्रकट करता है। इसे सरल रूप में समझते हैं:
पदच्छेद
द्वि-विरोधः इति चेत् — यदि यह कहा जाए कि (यहाँ) दो विरोध हैं
न — तो ऐसा नहीं है
सह-सम्भाव-उपपत्तेः — क्योंकि दोनों का साथ-साथ संभव होना सिद्ध है
सरल अर्थ
यदि कोई यह आपत्ति करे कि यहाँ दो परस्पर विरोधी तत्व (जैसे विद्या और अविद्या, या कर्म और ज्ञान) एक साथ बताए जा रहे हैं, इसलिए विरोध है —
तो उत्तर है: नहीं, ऐसा विरोध नहीं है, क्योंकि दोनों का एक साथ संभव होना तर्कसंगत (उपपन्न) है।
दार्शनिक व्याख्या
यह वाक्य विशेषतः ईशावास्योपनिषद् के उस प्रसंग में आता है जहाँ विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) के सह-अस्तित्व पर चर्चा है।
यहाँ शंकराचार्य का तात्पर्य यह है कि—
सामान्यतः ज्ञान और अज्ञान को विरोधी माना जाता है
परंतु यहाँ अविद्या = कर्म के अर्थ में लिया गया है, न कि पूर्ण अज्ञान के अर्थ में
इसलिए कर्म और ज्ञान का एक प्रकार का सह-अनुष्ठान संभव है (विशेष उद्देश्य से)
उदाहरण के लिए:
कर्म (अविद्या) → मन को शुद्ध करता है
ज्ञान (विद्या) → मोक्ष देता है
इस प्रकार, दोनों का क्रम या सीमित सह-अस्तित्व तर्कसंगत है, इसलिए “विरोध” नहीं कहा जा सकता।
गूढ़ संकेत
यह सूत्र यह भी बताता है कि—
हर “विरोध” वास्तविक नहीं होता
कभी-कभी वह केवल दृष्टिकोण (perspective) का अंतर होता है
उच्चतर स्तर पर, जो विरोध दिखता है, वह पूरक (complementary) भी हो सकता है
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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