क्रमेण एकाश्रये स्यातां विद्याविद्ये इति चेत् — न । विद्योत्पत्तौ अविद्याया नाशत्वात् तदाश्रयेऽवस्थानुपपत्तेः । न हि अग्निः शीतः।”
पदच्छेद और अर्थ
क्रमेण — क्रम से (एक के बाद एक)
एक-आश्रये — एक ही आश्रय (एक ही आत्मा/अधिष्ठान में)
स्याताम् विद्याविद्ये इति चेत् — यदि कहा जाए कि विद्या और अविद्या क्रम से एक ही आश्रय में रह सकती हैं
न — नहीं (यह स्वीकार्य नहीं)
विद्योत्पत्तौ — ज्ञान के उत्पन्न होने पर
अविद्याया नाशत्वात् — अविद्या का नाश हो जाता है
तदाश्रये अवस्थानुपपत्तेः — इसलिए उसी आश्रय में (दोनों का) साथ रहना असंभव है
न हि अग्निः शीतः — जैसे अग्नि शीतल नहीं हो सकती
सरल अर्थ
यदि कोई यह कहे कि विद्या (ज्ञान) और अविद्या (अज्ञान) एक ही आत्मा में क्रम से रह सकते हैं —
तो शंकराचार्य कहते हैं: नहीं।
क्योंकि—
जैसे ही ज्ञान उत्पन्न होता है,
अविद्या का पूर्ण नाश हो जाता है
इसलिए दोनों का एक ही आश्रय में रहना असंभव है।
जैसे अग्नि और शीतलता एक साथ नहीं हो सकते।
दार्शनिक गहराई
यहाँ आदि शंकराचार्य का मूल सिद्धांत स्पष्ट होता है:
1. ज्ञान और अज्ञान का संबंध
यह सह-अस्तित्व (co-existence) का नहीं, बल्कि
नाशक–नाश्य (destroyer–destroyed) का संबंध है
ज्ञान = प्रकाश
अविद्या = अंधकार
प्रकाश आते ही अंधकार समाप्त।
2. “समुच्चयवाद” का खंडन
यहाँ शंकराचार्य उस मत का खंडन कर रहे हैं जो कहता है कि:
कर्म (अविद्या) + ज्ञान (विद्या) मिलकर मोक्ष देंगे
शंकर का उत्तर:
ज्ञान आने पर अविद्या (कर्माधार) ही समाप्त हो जाती है
इसलिए दोनों का वास्तविक “समुच्चय” संभव नहीं
3. “न हि अग्निः शीतः” — उपमा का रहस्य
यह केवल उदाहरण नहीं, बल्कि सिद्धांत है:
अग्नि का स्वभाव = उष्णता
ज्ञान का स्वभाव = अविद्या-नाश
इसलिए:
जैसे अग्नि ठंडी नहीं हो सकती
वैसे ही ज्ञान रहते हुए अविद्या नहीं रह सकती
सूक्ष्म निष्कर्ष
पूर्व अवस्था: अविद्या (कर्म, संसार)
उत्तर अवस्था: विद्या (ज्ञान, मोक्ष)
दोनों के बीच क्षणिक संक्रमण हो सकता है
पर सह-अस्तित्व नहीं
एक गहरा संकेत (उपनिषद् शैली में)
यहाँ ईशावास्योपनिषद् का रहस्य यह है कि—
“अविद्या से पार होकर ही विद्या का उदय होता है,
पर विद्या के उदय पर अविद्या का कोई अस्तित्व नहीं बचता।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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