तेरी यादों का हर इक जाम ख़राब है,
मेरे हिस्से में बस तन्हा सा शराब है।
रात ठहरी है मेरी साँसों के दरमियाँ,
चाँद खिड़की पे खड़ा, ख़ामोश-सा हिसाब है।
मैंने पीकर भी तुझे भूलना चाहा था,
हर घूँट में मगर तेरा ही जवाब है।
ये जो सन्नाटा है कमरे में बिखरा हुआ,
मेरे अंदर की किसी चीख़ का नक़ाब है।
अब न मिलने की कोई आस, न गिला बाकी,
दिल के हर कोने में बस तेरा ही ख़्वाब है।
तन्हाई ने सिखा दी है ये बात मुझे,
हर खुशी के पीछे छुपा इक अज़ाब है।
मुकेश इलाहाबादी कहे किससे ये दर्द अपना,
उसके लफ़्ज़ों में भी अब थोड़ा-सा शराब है।
मुकेश,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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