“तदेजति तन्नैजति” — विरोधाभास का अद्वैत समन्वय (पंचम मन्त्र की भूमिका)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
न मन्त्राणां जामिता अस्ति इति पूर्वमन्त्र उक्तम्;
अथ पुनः “तदेजति” इति।
तत् आत्मतत्त्वं यत् उक्तं—तद् एजति, चरति; तदेव च न एजति, स्वतो न एव चरति।
स्वतः अचरम् एव सत्, चरति इव इत्यर्थः।
पूर्व मन्त्र में कहा गया था कि इन मन्त्रों में कोई विरोध नहीं है। अब पुनः कहा जाता है—“वह चलता है”।
जो आत्मतत्त्व पहले बताया गया है, वही चलता हुआ प्रतीत होता है, और वही नहीं चलता।
वास्तव में वह अपने स्वरूप से कभी नहीं चलता, परंतु चलता हुआ-सा प्रतीत होता है।
यह अंश ईशावास्योपनिषद् के पंचम मन्त्र — “तदेजति तन्नैजति” — की भूमिका के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ शंकराचार्य उस सम्भावित शंका का समाधान करते हैं जो साधक के मन में उत्पन्न होती है—क्या उपनिषद् स्वयं विरोधाभासी कथन कर रहा है?
पूर्व मन्त्रों में आत्मा को अचल, अविकार, एकरस बताया गया है। अब अचानक कहा जाता है—“तदेजति” (वह चलता है)। यह सुनकर जिज्ञासु के मन में भ्रम होना स्वाभाविक है कि यदि आत्मा नित्य अचल है, तो उसमें गति कैसे संभव है?
इसी शंका के समाधान के लिए शंकराचार्य कहते हैं
“न मन्त्राणां जामिता अस्ति”—मन्त्रों में कोई विरोध नहीं है।
विरोध केवल दृष्टिकोण (standpoint) का है, न कि तत्त्व का।
यहाँ “तद् आत्मतत्त्वम्”—जिस आत्मा का वर्णन पहले किया गया है, वही यहाँ विषय है। उस आत्मा के विषय में दो प्रकार के वचन दिए गए हैं—
“एजति” (चलता है)
“न एजति” (नहीं चलता)
इन दोनों को समझने के लिए अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धांत—उपाधि और निरुपाधि का भेद—जानना आवश्यक है।
वास्तव में आत्मा स्वतः अचरम् है—वह कभी नहीं चलता, क्योंकि वह सर्वव्यापक है। जहाँ सर्वत्र उपस्थित है, उसे कहीं जाने की आवश्यकता ही नहीं। अतः उसके लिए “गति” का कोई अर्थ नहीं है।
परंतु जब वही आत्मा शरीर, मन और इन्द्रियों के साथ तादात्म्य (अभिन्नता का अनुभव) कर लेता है, तब वह चलता हुआ प्रतीत होता है।
यही कारण है कि कहा गया—“चरति इव”—मानो चलता है।
यहाँ “इव” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सूचित करता है कि यह गति वास्तविक नहीं, बल्कि केवल आभास (appearance) है।
शंकराचार्य का अभिप्राय यह है कि,
आत्मा स्वयं अचल है, परंतु उपाधियों के कारण उसमें गति का आभास होता है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है,
जब हम किसी चलती हुई रेलगाड़ी में बैठकर बाहर देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि पेड़-पौधे पीछे की ओर जा रहे हैं। परंतु वास्तव में वे स्थिर हैं; गति केवल हमारी है।
इसी प्रकार, आत्मा स्थिर है, परंतु शरीर और मन की गति के कारण उसमें गति का आभास होता है।
यह भूमिका साधक को यह समझाने के लिए है कि,
उपनिषद् के वचनों को सामंजस्यपूर्ण दृष्टि से देखना चाहिए।
जहाँ आत्मा को अचल कहा गया है, वहाँ उसका पारमार्थिक स्वरूप बताया गया है।
और जहाँ उसे गतिशील कहा गया है, वहाँ उसका उपाधि-सापेक्ष व्यवहारिक स्वरूप वर्णित है।
इस भूमिका में शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि “तदेजति तन्नैजति” जैसे वचनों में कोई वास्तविक विरोध नहीं है। आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में अचल है, परंतु उपाधियों के कारण गतिशील प्रतीत होती है। यह भेद समझने से साधक उपनिषद् के गूढ़ अर्थ को ग्रहण कर सकता है और अद्वैत सत्य के निकट पहुँचता है।
मुकेश ,,,,,,
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