नित्यचैतन्यात्मा में समस्त क्रियाओं का आश्रय — अद्वैत का आधारतत्त्व
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
सर्वाणि हि काय-करणादि-विक्रियाः नित्यचैतन्यात्मस्वरूपे सर्वाश्रयभूते सति एव भवन्ति इत्यर्थः॥
सभी शरीर, इन्द्रियों आदि की क्रियाएँ नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा में, जो सबका आधार है, उसी में घटित होती हैं—यही इसका अर्थ है।
यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त के अत्यंत मौलिक सिद्धांत को प्रतिपादित करता है—समस्त क्रियाओं का अंतिम आश्रय आत्मा है, जो स्वयं नित्य चैतन्यस्वरूप और अविकार है।
“काय-करणादि-विक्रियाः”—इसमें शरीर (काय), इन्द्रियाँ (करण) और उनसे संबंधित सभी प्रकार की क्रियाएँ (चलना, बोलना, देखना, सोचना आदि) सम्मिलित हैं। संसार का जो भी गतिशील, परिवर्तनशील और क्रियात्मक पक्ष है, वह सब इसी श्रेणी में आता है।
अब प्रश्न यह है कि ये सभी क्रियाएँ कहाँ घटित होती हैं?
शंकराचार्य कहते हैं—“नित्यचैतन्यात्मस्वरूपे सर्वाश्रयभूते”—इन सबका आश्रय एक ही है, वह है नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा।
यहाँ “आश्रय” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है—वह आधार, जिसके बिना कोई क्रिया संभव नहीं। जैसे बिना पृथ्वी के कोई वस्तु स्थिर नहीं रह सकती, वैसे ही बिना चैतन्य के कोई भी अनुभव, क्रिया या ज्ञान संभव नहीं।
परंतु यहाँ एक सूक्ष्म भेद समझना आवश्यक है—
आत्मा इन क्रियाओं का कर्ता (doer) नहीं है, बल्कि केवल आश्रय (substratum) है।
अर्थात् क्रियाएँ आत्मा में घटित होती हैं, परंतु आत्मा स्वयं उनसे अप्रभावित रहता है।
यह अद्वैत वेदान्त का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है
आत्मा साक्षी है, कर्ता नहीं।
जब हम कहते हैं—“मैं चल रहा हूँ”, “मैं सोच रहा हूँ”, तो वास्तव में यह शरीर और मन की क्रियाएँ हैं। आत्मा केवल उन क्रियाओं का साक्षी है। परंतु अविद्या के कारण हम आत्मा को ही कर्ता मान लेते हैं—यही बंधन का कारण है।
शंकराचार्य का अभिप्राय है कि,
संसार की सभी क्रियाएँ, चाहे वे कितनी ही विविध क्यों न हों, एक ही चैतन्य पर आधारित हैं।
जैसे चलचित्र (movie) पर्दे पर चलता है—पात्र, घटनाएँ, गति सब कुछ दिखाई देता है, परंतु पर्दा स्वयं स्थिर और अपरिवर्तित रहता है।
उसी प्रकार, आत्मा में समस्त क्रियाएँ घटित होती हैं, परंतु आत्मा स्वयं नित्य, शुद्ध और अविकार रहता है।
यह समझना भी आवश्यक है कि,
यदि आत्मा न हो, तो न शरीर कार्य कर सकता है, न इन्द्रियाँ, न मन।
इसलिए आत्मा को सर्वाश्रय कहा गया है—सबका आधार।
परंतु यह आधारत्व भी व्यवहारिक स्तर पर है। पारमार्थिक दृष्टि से आत्मा केवल चैतन्य है—न वह कुछ करता है, न कुछ धारण करता है; यह सब केवल उपाधियों के कारण प्रतीत होता है।
इस भाष्यांश में यह स्पष्ट किया गया है कि शरीर, इन्द्रियों और मन की सभी क्रियाएँ नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा में ही घटित होती हैं, जो सबका आधार है। फिर भी आत्मा स्वयं अविकार और अकर्ता रहता है। इस ज्ञान से साधक समझता है कि वह वास्तव में क्रियाओं से परे शुद्ध साक्षी है—यही अद्वैत का परम सत्य और मोक्ष का मार्ग है।
मुकेश ,,,,,,,,
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