भयाधीन जगत् और ब्रह्म की सार्वभौमिक सत्ता — ‘भयात् वायुः पवते’ का अद्वैतार्थ
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
भयात् वायुः पवते इति श्रुतेः। तस्य भयात् (सर्वं प्रवर्तते)।
सरल हिंदी अर्थ
श्रुति में कहा गया है—“उस (ब्रह्म) के भय से वायु चलती है।”
अर्थात् उसी के भय (आदेश या नियमन) से यह समस्त जगत् कार्य करता है।
यह संक्षिप्त भाष्यांश अत्यंत गहन दार्शनिक तत्त्व को उद्घाटित करता है। “भयात् वायुः पवते”—यह वाक्य प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है मानो ब्रह्म कोई भय उत्पन्न करने वाली सत्ता हो, जिसके डर से वायु, अग्नि, सूर्य आदि कार्य कर रहे हैं। परंतु शंकराचार्य इस “भय” शब्द का अत्यंत सूक्ष्म अर्थ ग्रहण करते हैं।
यहाँ “भय” का अर्थ सामान्य मानसिक भय (डर) नहीं है, बल्कि नियमन (cosmic order), आदर, या अनिवार्य अनुशासन है। यह उस परम सत्ता का संकेत है, जिसके अधीन समस्त प्रकृति का संचालन होता है। अर्थात् यह “भय” वास्तव में ब्रह्म की सर्वोच्च सत्ता और शासन का प्रतीक है।
वायु का स्वभाव है चलना—“पवते”। परंतु यह चलना स्वतन्त्र नहीं, बल्कि एक निश्चित नियम और व्यवस्था के अधीन है। यह व्यवस्था स्वतः नहीं उत्पन्न हुई, बल्कि उसके पीछे एक अदृश्य, सर्वव्यापक चेतन सत्ता है—वही ब्रह्म।
शंकराचार्य का अभिप्राय है कि,
यदि यह ब्रह्म न हो, तो प्रकृति में कोई नियम, कोई संतुलन, कोई क्रम नहीं रह सकता।
वायु अनियंत्रित हो जाए, अग्नि असंतुलित हो जाए, सूर्य अपनी गति से विचलित हो जाए—तो सृष्टि का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाए।
इसलिए “भयात्” का तात्पर्य है
उस परम सत्ता के प्रति एक अनिवार्य अनुशासन, जिसके कारण सभी तत्त्व अपने-अपने नियमों का पालन करते हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अद्वैत दृष्टिकोण यह भी है कि
ब्रह्म स्वयं किसी से भयभीत नहीं करता, क्योंकि वह निराकार, निर्विकार और अकर्ता है।
परंतु उपाधियों (ईश्वर, हिरण्यगर्भ आदि) के स्तर पर वही ब्रह्म नियामक शक्ति के रूप में कार्य करता है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे एक राजा के शासन में सभी नागरिक नियमों का पालन करते हैं। यह पालन केवल डर से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति स्वीकृति और सम्मान के कारण होता है।
उसी प्रकार, समस्त प्रकृति ब्रह्म के “भय” से नहीं, बल्कि उसकी सत्ता और नियमबद्धता के कारण संचालित होती है।
शंकराचार्य का उद्देश्य यहाँ यह दिखाना है कि
जगत् स्वतन्त्र नहीं है; वह एक परम चेतन सत्ता पर आश्रित है।
और वही सत्ता अद्वैत वेदान्त में आत्मा या ब्रह्म के रूप में जानी जाती है।
इस भाष्यांश में “भय” शब्द के माध्यम से ब्रह्म की सर्वोच्च सत्ता और नियामक शक्ति का निरूपण किया गया है। वायु, अग्नि, सूर्य आदि सभी तत्त्व उसी के अधीन कार्य करते हैं। यह भय वास्तविक डर नहीं, बल्कि एक ब्रह्माधीन व्यवस्था का संकेत है। इस प्रकार, अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म ही समस्त जगत् का आधार और नियामक है, जिसके कारण सृष्टि में क्रम और संतुलन बना रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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