खाली चौखट
1
खाली चौखट
कोई दरवाज़ा
अब लौटकर नहीं आता।
2
दहलीज़ पर धूप है,
पर कदमों की आहट
कहीं खो गई है।
3
एक समय
यहीं से हँसी गुज़रती थी,
अब हवा भी
धीरे-धीरे चलती है।
4
चौखट के किनारों पर
हाथों के निशान हैं
जैसे विदाई
अब भी ठहरी हो।
5
कोई नाम
धीरे से पुकारो,
आवाज़ लौटकर
यहीं बैठ जाती है।
6
शाम होते ही
ये और खाली लगती है,
जैसे किसी का इंतज़ार
अभी बाकी हो।
7
दीवारें चुप हैं,
पर चौखट
सब कुछ जानती है।
8
कभी कोई
अचानक आ जाए
इस उम्मीद में
वो अब भी खड़ी है।
9
खाली चौखट
घर नहीं छोड़ती,
बस अपने भीतर
सबको जाते हुए देखती है।
10
एक दिन
वो भी थक जाएगी
और घर
सचमुच सूना हो जाएगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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