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Friday, 3 April 2026

बातें जो कही नहीं गईं (संवाद शैली)

 बातें जो कही नहीं गईं (संवाद शैली)


वो:

तुम आजकल कुछ चुप-चुप से रहते हो… सब ठीक है?


मैं:

हाँ… सब ठीक है।


वो:

पक्का?

तुम पहले ऐसे नहीं थे।


मैं:

लोग बदल जाते हैं…


वो:

या कुछ छुपाने लगते हैं?


मैं:

हर बात कह देना ज़रूरी नहीं होता…


वो:

लेकिन कुछ बातें न कही जाएँ

तो गलतफहमियाँ भी हो सकती हैं।


मैं:

और कुछ बातें कह दी जाएँ

तो रिश्ते भी बदल जाते हैं…


वो:

(थोड़ी देर चुप रहकर)

क्या हमारे बीच भी कुछ बदलने वाला है?


मैं:

नहीं…

हमारे बीच सब वैसा ही रहेगा।


(धीरे से)

जैसा तुम चाहती हो…


वो:

तुम अजीब हो…

कभी लगता है बहुत कुछ कहना चाहते हो

फिर अचानक चुप हो जाते हो।


मैं:

कुछ बातें…

कहने से ज़्यादा

छुपाने में सुरक्षित लगती हैं।


वो:

मुझसे भी?


मैं:

खुद से भी…


वो:

(हल्की मुस्कान के साथ)

तुम ना… बहुत अच्छे दोस्त हो।


मैं:

(मुस्कुराते हुए)

हाँ…

बस दोस्त ही अच्छा हूँ।


वो:

क्या मतलब?


मैं:

कुछ नहीं…

तुम बताओ, आजकल किससे बात कर रही हो ज़्यादा?


वो:

(खुश होकर)

एक है… अच्छा लगता है।


मैं:

अच्छा है…

तुम खुश रहो।


वो:

तुम सच में खुश हो मेरे लिए?


मैं:

(थोड़ा रुककर)

हाँ…

खुशी…

सीख ली है मैंने।


वो:

कभी-कभी लगता है

तुम कुछ कहोगे…


मैं:

कभी-कभी लगता है

तुम सुनोगी…


वो:

तो फिर कहते क्यों नहीं?


मैं:

क्योंकि

कुछ बातें

कह दी जाएँ

तो…


वो:

तो?


मैं:

तो

“दोस्ती”

बचती नहीं…


वो:

(चुप)


मैं:

(चुप)


वो:

चलो…

कल मिलते हैं?


मैं:

हाँ…

जैसे हमेशा मिलते हैं।


(दोनों अलग-अलग दिशाओं में चलते हैं)


मैं (मन में):

आज भी

वो बातें नहीं कह पाया…


वो (मन में):

आज भी

कुछ था

जो उसने कहा नहीं…


बातें जो कही नहीं गईं


कभी-कभी

दो लोग

सब कुछ समझते हैं


फिर भी

कुछ भी नहीं कहते…


मुकेश ,

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