बातें जो कही नहीं गईं (संवाद शैली)
वो:
तुम आजकल कुछ चुप-चुप से रहते हो… सब ठीक है?
मैं:
हाँ… सब ठीक है।
वो:
पक्का?
तुम पहले ऐसे नहीं थे।
मैं:
लोग बदल जाते हैं…
वो:
या कुछ छुपाने लगते हैं?
मैं:
हर बात कह देना ज़रूरी नहीं होता…
वो:
लेकिन कुछ बातें न कही जाएँ
तो गलतफहमियाँ भी हो सकती हैं।
मैं:
और कुछ बातें कह दी जाएँ
तो रिश्ते भी बदल जाते हैं…
वो:
(थोड़ी देर चुप रहकर)
क्या हमारे बीच भी कुछ बदलने वाला है?
मैं:
नहीं…
हमारे बीच सब वैसा ही रहेगा।
(धीरे से)
जैसा तुम चाहती हो…
वो:
तुम अजीब हो…
कभी लगता है बहुत कुछ कहना चाहते हो
फिर अचानक चुप हो जाते हो।
मैं:
कुछ बातें…
कहने से ज़्यादा
छुपाने में सुरक्षित लगती हैं।
वो:
मुझसे भी?
मैं:
खुद से भी…
वो:
(हल्की मुस्कान के साथ)
तुम ना… बहुत अच्छे दोस्त हो।
मैं:
(मुस्कुराते हुए)
हाँ…
बस दोस्त ही अच्छा हूँ।
वो:
क्या मतलब?
मैं:
कुछ नहीं…
तुम बताओ, आजकल किससे बात कर रही हो ज़्यादा?
वो:
(खुश होकर)
एक है… अच्छा लगता है।
मैं:
अच्छा है…
तुम खुश रहो।
वो:
तुम सच में खुश हो मेरे लिए?
मैं:
(थोड़ा रुककर)
हाँ…
खुशी…
सीख ली है मैंने।
वो:
कभी-कभी लगता है
तुम कुछ कहोगे…
मैं:
कभी-कभी लगता है
तुम सुनोगी…
वो:
तो फिर कहते क्यों नहीं?
मैं:
क्योंकि
कुछ बातें
कह दी जाएँ
तो…
वो:
तो?
मैं:
तो
“दोस्ती”
बचती नहीं…
वो:
(चुप)
मैं:
(चुप)
वो:
चलो…
कल मिलते हैं?
मैं:
हाँ…
जैसे हमेशा मिलते हैं।
(दोनों अलग-अलग दिशाओं में चलते हैं)
मैं (मन में):
आज भी
वो बातें नहीं कह पाया…
वो (मन में):
आज भी
कुछ था
जो उसने कहा नहीं…
बातें जो कही नहीं गईं
कभी-कभी
दो लोग
सब कुछ समझते हैं
फिर भी
कुछ भी नहीं कहते…
मुकेश ,
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