डायरी: बातें जो कही नहीं गईं
दिन 1
आज तुम सामने थे
और मेरे पास
कहने के लिए बहुत कुछ था…
लेकिन
मैंने सिर्फ पूछा—
“कैसे हो?”
दिन 8
हम घंटों साथ बैठे
बातें भी हुईं
पर जो कहना था
वो हर बार
होंठों तक आकर
वापस लौट गया…
दिन 15
आज मैंने तय किया था
कि सब कह दूँगा
लेकिन
तुम्हारी एक मुस्कान ने
मुझे फिर चुप कर दिया…
दिन 22
कभी-कभी लगता है
हमारे बीच
शब्द कम नहीं हैं
हिम्मत कम है…
दिन 30
तुमने पूछा—
“तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”
मैंने हँसकर टाल दिया
कैसे बताता
कि मेरी सारी बातें
तुमसे ही शुरू होकर
तुम पर ही खत्म होती हैं…
दिन 45
आज तुमने
किसी और का नाम लिया
मैंने सिर हिलाया
जैसे सब ठीक है
और अंदर
कुछ बहुत धीरे टूट गया…
दिन 60
अब मैं
कम बोलता हूँ
क्योंकि
जो कहना है
वो कह नहीं सकता
और जो कह सकता हूँ
वो ज़रूरी नहीं लगता…
दिन 80
हम अब भी मिलते हैं
हँसते हैं
बातें करते हैं
बस
वो बातें
आज तक नहीं हुईं
जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी थीं…
दिन 100
आज लगा
कि शायद
अब कह देने का कोई मतलब नहीं
कुछ बातें
समय के साथ
कहने लायक नहीं रहतीं…
दिन 120 — अंतिम पन्ना
अगर उस दिन
मैंने कह दिया होता
तो शायद
कहानी अलग होती…
या
शायद वही रहती
बस
यह “काश” नहीं होता…
बातें जो कही नहीं गईं
कभी-कभी
रिश्ते
बातों से नहीं
खामोशियों से
खत्म हो जाते हैं…
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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