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Friday, 10 April 2026

मैं—नदी का घाट।

 मैं—नदी का घाट।

पत्थरों की सीढ़ियों में ढली एक स्मृति,

जहाँ जल केवल बहता नहीं

जीवन ठहर-ठहर कर अपने अर्थ खोजता है।


तुम मुझे बस उतरने-चढ़ने की जगह समझते हो,

पर मैं उन कदमों का संग्रह हूँ

जो श्रद्धा, थकान, प्रेम और विरह लेकर

मेरी देह पर पड़ते हैं।


मैंने अनगिनत सूर्योदय देखे हैं

जब पहली किरण

नदी के माथे को छूती है,

और लोग अपने भीतर की अंधेरी परतों को

जल में उतारने आते हैं।


मेरी सीढ़ियाँ केवल पत्थर नहीं,

ये समय के पन्ने हैं

जहाँ हर कदम एक कहानी है,

हर ठहराव एक प्रार्थना।


कभी कोई माँ

अपने बच्चे का पहला स्नान कराती है,

तो कहीं कोई वृद्ध

अपने जीवन की अंतिम इच्छाएँ

जल में सौंप जाता है।


मैंने हँसी भी सुनी है,

और रोना भी

मेरे किनारों पर

जीवन और मृत्यु

एक साथ बैठकर बातें करते हैं।


शाम होते ही

दीपों की कतारें सजती हैं,

और मैं रोशनी से भर उठता हूँ

जैसे अँधेरे को भी

कोई रास्ता मिल गया हो।


पर मेरी कहानी केवल आध्यात्मिक नहीं

मैं इतिहास का साक्षी भी हूँ।

मेरे किनारों पर सभ्यताएँ पनपीं,

व्यापार हुआ, संवाद हुआ,

और समय ने अपने निशान छोड़े।


आज भी लोग आते हैं

पर बदल गई है उनकी दृष्टि।

कुछ मेरे सौंदर्य में तस्वीरें खोजते हैं,

कुछ मेरी गहराई में अर्थ।


मेरे पत्थर घिस गए हैं,

पर मेरी स्मृतियाँ नहीं

हर लहर के साथ

वे फिर जीवित हो उठती हैं।


कभी-कभी मैं भी थक जाता हूँ

जब मेरे जल को मैला किया जाता है,

जब मेरी शांति को शोर से भर दिया जाता है।


पर मैं फिर भी स्थिर हूँ

क्योंकि मेरा धर्म है

लोगों को जोड़ना

धरती से जल,

और जल से आत्मा तक।


मैं घाट हूँ

नदी का किनारा नहीं,

बल्कि उस किनारे का अर्थ हूँ।


अगर कभी तुम सच में

खुद से मिलना चाहो,

तो मेरी सीढ़ियों पर बैठना

और बहते जल को देखना…


शायद तुम्हें समझ आ जाए

कि जीवन भी एक नदी है,

और हम सब

बस उसके किनारे ठहरते हुए

कुछ पल के यात्री।


मुकेश ,,,,,,,,,

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