मैं—एक कबूतर।
तुम्हारी नज़र में साधारण,
पर विज्ञान की दृष्टि में
एक जटिल रहस्य।
मेरा नाम भले ही आम है,
पर मेरी प्रजाति—Columba livia
सदियों से मानव सभ्यता के साथ
एक सहजीवी (symbiotic) संबंध में रही है।
मैंने तुम्हारे शहर बसते देखे हैं,
और उनसे पहले
चट्टानों की खामोशी में भी जीवन जिया है।
आज तुम मुझे इमारतों पर देखते हो
पर ये दीवारें ही मेरे लिए
आधुनिक “चट्टानें” हैं।
मेरी सबसे बड़ी पहचान
मेरी “घर लौटने की क्षमता” (homing ability)।
तुमने सुना होगा
दूर छोड़े जाने के बाद भी
मैं अपने घोंसले तक पहुँच जाता हूँ।
यह जादू नहीं,
बल्कि एक जटिल जैव-भौतिक प्रणाली है
मैं पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) को महसूस करता हूँ,
सूर्य की दिशा को पढ़ता हूँ,
और गंध के संकेतों को भी पहचानता हूँ।
कई प्रयोग हुए हैं मुझ पर
वैज्ञानिकों ने मुझे सैकड़ों किलोमीटर दूर छोड़ा,
और मैंने फिर भी रास्ता खोज लिया।
तुम सोचते हो,
मैं बस दाने चुगता हूँ
पर मेरे भोजन चयन में भी
ऊर्जा-संतुलन (energy optimization) छिपा है।
मैं बीज खाता हूँ,
पर उसी के साथ
शहरों की पारिस्थितिकी (urban ecology) का हिस्सा बन जाता हूँ।
मेरे प्रजनन का तरीका भी रोचक है
मैं और मेरी संगिनी
मिलकर अंडों को सेते हैं।
हाँ,
यहाँ “पितृत्व” भी सक्रिय है
मैं केवल साथी नहीं,
सह-पालक (co-parent) हूँ।
मेरे बच्चों को
मैं “क्रॉप मिल्क” (crop milk) खिलाता हूँ
यह एक विशेष द्रव है,
जो मेरे शरीर में बनता है।
तुम्हें लगता है
मैं हर जगह एक जैसा हूँ
पर मेरे रंग, आकार, व्यवहार
पर्यावरण के अनुसार बदलते हैं।
मैंने युद्धों में भी सेवा दी
संदेशवाहक बनकर,
जब तकनीक इतनी विकसित नहीं थी।
पर आज
मैं भीड़ में खो गया हूँ।
लोग मुझे अनदेखा कर देते हैं,
या केवल “गंदगी” का कारण मानते हैं।
मेरे अस्तित्व का अध्ययन
अब भी जारी है
क्योंकि मैं केवल एक पक्षी नहीं,
बल्कि “अनुकूलन” (adaptation) का जीवित उदाहरण हूँ।
मैं कबूतर हूँ
न कोई रहस्यपूर्ण चमत्कार,
न ही कोई साधारण जीव
मैं विज्ञान और जीवन के बीच
एक पुल हूँ।
अगर तुम सच में मुझे समझना चाहो,
तो मुझे केवल उड़ते हुए मत देखो
मेरी दिशा को समझो…
क्योंकि मैं
केवल पंखों से नहीं,
ज्ञान से भी उड़ता हूँ।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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