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Sunday, 19 April 2026

ईशावास्योपनिषद् — द्वादश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (असंभूति–संभूति का रहस्य)

 ईशावास्योपनिषद् — द्वादश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (असंभूति–संभूति का रहस्य)

मन्त्र

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिम् उपासते ।

ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याम् रताः ॥१२॥

अन्वय

ये (जनाः) असम्भूतिम् उपासते, ते अन्धं तमः प्रविशन्ति।

ये उ सम्भूत्याम् रताः, ते ततः अपि भूयः इव तमः (प्रविशन्ति)।

जो लोग “असंभूति” (अव्यक्त, प्रकृति आदि) की उपासना करते हैं, वे अन्धकार में प्रवेश करते हैं; और जो केवल “संभूति” (सृष्ट, कार्यरूप, हिरण्यगर्भ आदि) में ही रत रहते हैं, वे उससे भी अधिक गहन अन्धकार में गिरते हैं।

ईशावास्योपनिषद् के द्वादश मन्त्र में एक बार पुनः वही शैली दिखाई देती है, जो नवम मन्त्र में विद्या और अविद्या के संदर्भ में प्रस्तुत की गई थी। यहाँ “संभूति” और “असंभूति” के माध्यम से उपनिषद् साधना के दो भिन्न मार्गों का निरूपण करता है और उनके एकांगी अनुसरण के दोष को प्रकट करता है।


“असंभूति” शब्द का सामान्य अर्थ है— जो उत्पन्न नहीं हुआ, अर्थात् अव्यक्त, प्रकृति, मूल कारण। यह वह स्थिति है जो समस्त सृष्टि का बीज है, परन्तु स्वयं अप्रकट है। जो साधक इस अव्यक्त प्रकृति को ही अंतिम सत्य मानकर उसकी उपासना करता है, वह “अन्धं तमः”— गहन अज्ञान— में प्रवेश करता है। इसका कारण यह है कि प्रकृति स्वयं जड़ है, और जड़ का ध्यान अंततः चेतना को उन्नत नहीं कर सकता।


इसके विपरीत, “संभूति” का अर्थ है— जो उत्पन्न हुआ है, अर्थात् सृष्ट जगत्, विशेषतः हिरण्यगर्भ या कार्य-ब्रह्म। यह सृष्टि का सूक्ष्म कारण है, जो चेतना से युक्त है और उपासना का एक उच्चतर विषय माना जाता है। परन्तु उपनिषद् यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म चेतावनी देता है— कि जो साधक केवल “संभूति” में ही रत रहते हैं, वे “भूय इव तमः”— उससे भी अधिक गहन अन्धकार में पड़ते हैं।

यह कथन प्रथम दृष्टि में अत्यन्त विरोधाभासी प्रतीत होता है, क्योंकि हिरण्यगर्भ या सृष्ट चेतन तत्व की उपासना तो उच्चतर मानी जाती है। फिर भी इसे “अधिक अन्धकार” क्यों कहा गया? इसका उत्तर दार्शनिक है।

जब साधक केवल सृष्ट, व्यक्त, कार्य-ब्रह्म में ही आसक्त हो जाता है, तो वह उसे ही अंतिम सत्य मान लेता है। यह आसक्ति एक सूक्ष्म अहंकार को जन्म देती है कि उसने उच्चतम सत्य को प्राप्त कर लिया है। यही भ्रम उसे वास्तविक ब्रह्मज्ञान से दूर कर देता है। अतः यह “अधिक अन्धकार” वास्तव में सूक्ष्म अज्ञान है, जो स्थूल अज्ञान से भी अधिक गहरा होता है।

यहाँ यह स्पष्ट होता है कि—

असंभूति की उपासना → जड़ता में बन्धन

संभूति की उपासना → सूक्ष्म अहंकार में बन्धन

दोनों ही स्थितियाँ अंतिम सत्य से दूर रखती हैं।

इस प्रकार, यह मन्त्र पुनः उसी सिद्धान्त की पुष्टि करता है, जो पहले विद्या और अविद्या के संदर्भ में कहा गया था— कि किसी एक पक्ष में ही रत रहना साधक को बन्धन में डाल देता है।

आदि शंकराचार्य के अनुसार, यहाँ भी उद्देश्य इन उपासनाओं का निषेध नहीं, बल्कि उनकी सीमाओं का बोध कराना है। आगे के मन्त्र (१३) में इन दोनों के समुच्चय की ओर संकेत किया गया है, जिससे साधक क्रमशः उच्चतर सत्य की ओर अग्रसर हो सके।

इस मन्त्र का सार यह है कि

प्रकृति (असंभूति) और सृष्ट (संभूति) दोनों ही साधना के विषय हो सकते हैं,

परन्तु दोनों में ही अंतिम सत्य नहीं है।

यदि साधक इनमें से किसी एक को ही परम मान लेता है, तो वह अज्ञान में ही रहता है— चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म।

ईशावास्योपनिषद् का यह द्वादश मन्त्र साधक को पुनः सावधान करता है कि वह साधना के मार्ग में किसी भी स्तर को अंतिम न माने।

न जड़ में रुकना है, न सृष्ट में;

बल्कि दोनों के पार जाकर उस परम तत्त्व को जानना है,

जहाँ से सब उत्पन्न होता है और जिसमें सब लीन हो जाता है।

यही इस मन्त्र का गूढ़ संदेश है।


मुकेश ,,,,

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