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Sunday, 19 April 2026

देवतात्मभाव की प्राप्ति — “विद्यया… अमृतम् अश्नुते” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

 देवतात्मभाव की प्राप्ति — “विद्यया… अमृतम् अश्नुते” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

विद्यया — देवताज्ञानेन;
अमृतम् अश्नुते — देवतात्मभावम् अनुप्राप्नोति;
तत् हि अमृतत्वम् उच्यते — यत् देवतात्मगमनम्॥११॥

ईशावास्योपनिषद् के एकादश मन्त्र का उत्तरार्ध— “विद्यया अमृतम् अश्नुते”— साधना-पथ के उस उच्च चरण को प्रकट करता है, जहाँ उपासना (विद्या) के माध्यम से साधक एक विशेष प्रकार की “अमृतता” को प्राप्त करता है। आदि शंकराचार्य इस पद का अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यहाँ “अमृतत्व” का अर्थ परमब्रह्म की अद्वैत सिद्धि नहीं, बल्कि देवतात्मभाव की प्राप्ति है।

“विद्यया” — उपासना का विशिष्ट अर्थ

शंकराचार्य “विद्यया” का अर्थ करते हैं—
देवताज्ञान, अर्थात् देवता-विषयक उपासना

यह केवल सैद्धान्तिक ज्ञान नहीं, बल्कि—

  • ध्यान
  • चिन्तन
  • भावात्मक एकाग्रता

जिसमें साधक अपने उपास्य देवता के स्वरूप में निरन्तर स्थित रहने का अभ्यास करता है।

“अमृतम् अश्नुते” — अमृतत्व का स्वरूप

सामान्यतः “अमृत” शब्द का अर्थ लिया जाता है—
मृत्यु का अभाव, शाश्वतता

किन्तु यहाँ शंकराचार्य इसका विशिष्ट अर्थ बताते हैं—

“देवतात्मभावम् अनुप्राप्नोति”
अर्थात्— साधक देवता के स्वरूप को प्राप्त करता है

यहाँ अमृतत्व का अभिप्राय है—
 देवता के साथ तादात्म्य (identification)
 उसी के लोक, स्वरूप और सत्ता में प्रवेश

“देवतात्मभाव” — तादात्म्य की अवस्था

“देवतात्मभाव” का अर्थ है—

  • साधक अपने उपास्य देवता के साथ एक प्रकार की एकता का अनुभव करता है
  • उसका चित्त उसी देवता के गुणों, स्वरूप और सत्ता में लीन हो जाता है

यहाँ—
उपासक और उपास्य का भेद अत्यन्त सूक्ष्म रह जाता है
किन्तु पूर्णतः समाप्त नहीं होता

अतः यह अवस्था—

  • अद्वैत नहीं
  • बल्कि उच्चतर द्वैत की पराकाष्ठा है

“देवतात्मगमनम्” — अमृतत्व की परिभाषा

शंकराचार्य स्पष्ट कहते हैं—

“तत् हि अमृतत्वम् उच्यते — यत् देवतात्मगमनम्”

अर्थात्—
देवता के स्वरूप में गमन ही अमृतत्व कहलाता है

यहाँ “गमन” का अर्थ केवल स्थान-परिवर्तन नहीं, बल्कि—

  • चेतना का रूपान्तरण
  • अस्तित्व की उन्नति

साधक—
देवता के लोक में प्रवेश करता है
उसी के स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है

गहन दार्शनिक संकेत

यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म भेद समझना आवश्यक है—

  • देवतात्मभावब्रह्मात्मभाव

देवतात्मभाव में—

  • अभी भी भेद की सूक्ष्म रेखा है
  • उपासना का संस्कार बना रहता है

जबकि ब्रह्मज्ञान में—
समस्त भेदों का पूर्ण लय हो जाता है

अतः—
यह अमृतत्व परम मोक्ष नहीं
बल्कि क्रममुक्ति का एक उच्च चरण है

समुच्चय के संदर्भ में स्थान

पूर्व पद में कहा गया—

  • “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा” — कर्म से शुद्धि

अब यहाँ—

  • “विद्यया अमृतम् अश्नुते” — उपासना से उन्नति

अतः—

  1. कर्म → बन्धनों से उन्मुक्ति
  2. उपासना → देवतात्मभाव की प्राप्ति
  3. (अंततः) ज्ञान → परम मोक्ष

दृष्टांत

जैसे—
एक दीपक की लौ के समीप बैठा व्यक्ति धीरे-धीरे उसी प्रकाश में स्नान करने लगता है,
वैसे ही उपासक—
अपने उपास्य के प्रकाश में इतना लीन हो जाता है कि
वह उसी का स्वरूप धारण कर लेता है।

इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “विद्यया अमृतम् अश्नुते” का अर्थ परमब्रह्म की अद्वैत सिद्धि नहीं, बल्कि देवतात्मभाव की प्राप्ति है— जहाँ साधक अपने उपास्य देवता के स्वरूप को प्राप्त करता है।

अतः—
उपासना का चरम फल देवता के साथ तादात्म्य है, और वही यहाँ ‘अमृतत्व’ कहलाता है।

किन्तु यह अन्तिम नहीं, बल्कि उस परम सत्य की ओर अग्रसर होने का एक उच्च चरण है, जहाँ समस्त भेदों का पूर्ण लय हो जाता है।

मुकेश ,,,,


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