सुनो कमला…
सुनो कमला…
तुम्हें हमने
कभी नाम से नहीं पुकारा
हमारे लिए तुम हमेशा
“अकेली औरत” ही रहीं।
गली के उस मकान में
जहाँ दरवाज़ा कम
और नज़रें ज़्यादा खुलती हैं
तुम रहती हो।
सुबह
तुलसी में पानी डालती हुई,
शाम
चुपचाप दीया जलाती हुई
जैसे तुम्हारा जीवन
बस इन दो समयों के बीच
अटका हुआ हो।
कहते हैं
तुम्हारी शादी नहीं हुई।
कुछ कहते हैं
हुई थी…
पर निभी नहीं।
कुछ कहते हैं
वह चला गया
या तुम छोड़ दी गईं।
सच क्या है
यह किसी ने जानना नहीं चाहा।
क्योंकि
हमारे लिए
कहानी से ज़्यादा
उसका निष्कर्ष ज़रूरी था
“अकेली है…”
हाँ! कमला…
हमने तुम्हें
हमेशा शक की नज़र से देखा
तुम हँस दो तो
“इशारा”
तुम चुप रहो तो
“घमंड”
तुम किसी से बात कर लो तो
“चरित्र”
और न करो तो
“रहस्य”
तुम्हारे जीवन का हर रंग
हमने
अपनी सुविधा से तय किया।
तुम बाज़ार जाती हो
तो आँखें पीछा करती हैं।
तुम छत पर कपड़े सुखाती हो
तो फुसफुसाहटें उठती हैं।
तुम रात को
थोड़ा देर तक जाग जाओ
तो कहानियाँ बन जाती हैं।
और इन सबके बीच
तुम बस जीती हो
धीरे-धीरे,
बिना शोर के।
कितनी बार
तुमने चाहा होगा
कि कोई तुम्हें
नाम से पुकारे
कोई पूछे
“कमला, तुम कैसी हो?”
पर हमने
तुम्हारी पहचान को
एक शब्द में समेट दिया
“अकेली”
हाँ! कमला…
तुम अधूरी नहीं थीं—
हमारी सोच अधूरी थी।
तुम छूटी नहीं थीं
हमने तुम्हें छोड़ दिया था।
तुम अकेली नहीं थीं
हम सब मिलकर
तुम्हें अकेला करते रहे।
और आज भी
जब तुम दरवाज़े पर बैठी
चुपचाप दुनिया देखती हो—
तो लगता है
तुम हमसे नहीं,
हमारी नज़रों से थक गई हो।
हाँ…
अगर अकेलापन
एक दोष है
तो दोषी तुम नहीं,
हम हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 16 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteमार्मिक रचना! वाक़ई कितनी गहरी सच्चाई छुपी है इन पंक्तियों में
ReplyDeleteWahhh
ReplyDeleteबहुत खूब!!
ReplyDeleteह्रदय विदारक..मार्मिक चित्रण..चेतावनी...कहीं हम भी तो ऐसा नहीं कर रहे किसी के साथ ?
ReplyDeleteसंवेदनशील समाज वरदान है । अभिनंदन ।