राशिफल में फँसा हुआ देश
सुबह जब अख़बार खुलता है,
तो पहले पन्ने पर नहीं,
किनारे छपे छोटे-से कॉलम में
देश की धड़कन दिखाई देती है
“आज का दिन आपके लिए मिश्रित फल देगा।”
मैं सोचता हूँ,
क्या सचमुच इतना ही है हमारा भाग्य?
कुछ “शुभ”, कुछ “अशुभ”,
और बाकी सब
एक सामान्य-सी चेतावनी?
सड़कों पर चलते हुए
लोग मुझे अक्षरों जैसे लगते हैं—
किसी का “क” अधूरा,
किसी का “ष” टूटा हुआ,
और पूरा वाक्य
कहीं अर्थहीन-सा बिखरा पड़ा है।
जैसे भाषा भी
किसी ग्रह की चाल से प्रभावित हो।
चौराहों पर खड़े पुलिसवाले
मुझे राहु जैसे लगते हैं
रास्तों को निगलते हुए,
और ट्रैफिक की भीड़
किसी अंतहीन ग्रहण में फँसी हुई।
घर लौटकर
मैं अपनी हथेलियों को देखता हूँ,
रेखाएँ अब भी वही हैं—
लेकिन उनका अर्थ बदल गया है।
अब वे केवल मेरा भविष्य नहीं,
बल्कि एक पूरे देश का
अनकहा इतिहास ढो रही हैं।
टीवी पर बहस चल रही है,
कोई कहता है—
“समय बदल रहा है।”
कोई कहता है—
“यह तो पहले से लिखा था।”
और मैं चुपचाप
दोनों के बीच की खाई में
अपनी आवाज़ ढूँढ़ता हूँ।
कभी-कभी लगता है,
हम सब
एक ही पन्ने पर छपे राशिफल हैं
जहाँ हर व्यक्ति को
अलग-अलग उम्मीदें दी गई हैं,
पर डर
सबका एक-सा है।
रात को जब नींद नहीं आती,
मैं आकाश को देखता हूँ—
तारों की जगह
मुझे टूटे हुए वादे दिखते हैं,
और चाँद
एक अधूरी घोषणा-सा लगता है।
और फिर अचानक,
एक सवाल उठता है
क्या हम सच में
राशिफल में फँसे हुए हैं,
या हमने ही
अपनी स्वतंत्रता को
किसी भविष्यवाणी के हवाले कर दिया है?
मैं जवाब नहीं जानता,
पर हर सुबह
अख़बार खोलते हुए
एक उम्मीद बची रहती है
कि शायद किसी दिन
राशिफल का वह छोटा-सा कॉलम
खाली होगा,
और देश
अपने भाग्य को
खुद लिखना शुरू करेगा।
मुकेश ,,,,,,,
No comments:
Post a Comment