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Sunday, 26 April 2026

ग्रहों का खेल

 ग्रहों का खेल 

कई दिनों से मैं यह सोच रहा हूँ,

कि क्या सचमुच

देश भी एक कुंडली होता है?


जहाँ सीमाएँ

केवल नक्शे की रेखाएँ नहीं,

बल्कि जन्म-लग्न की तरह

किसी अदृश्य समय पर टिके हुए बिंदु हैं।


मैं जब सड़कों पर निकलता हूँ,

तो भीड़ मुझे

ग्रहों की चाल जैसी लगती है

कोई तेजी से भागता हुआ मंगल,

कोई ठहरा हुआ शनि,

कोई भ्रम में डूबा चंद्रमा।


और बीच में खड़ा मैं,

अपने ही पसीने और धूल में लिपटा,

जैसे कोई अशुभ योग।


घर में अब भी

पुरानी बातें जिंदा हैं

माँ की आँखों में

किसी अनकहे डर की परछाईं,

और पिता की उँगलियाँ

अब भी अदृश्य रेखाओं को छूती हुई।


कभी लगता है,

उन्होंने मुझे नहीं,

समय को पढ़ना चाहा था

पर समय

हमेशा उनकी पकड़ से फिसलता रहा।


मौसा की कहानी

अब भी एक धुंधली गूंज है

प्रेम, धर्म, और पहचान के बीच

फँसी हुई एक अधूरी दास्तान,

जैसे राहु ने

किसी के नाम को निगल लिया हो।


रात में

जब नींद नहीं आती,

मैं खिड़की से बाहर देखता हूँ

शहर की बत्तियाँ

मुझे टूटते हुए नक्षत्र लगती हैं।


और कहीं दूर,

कोई अदृश्य शक्ति

इन सबको खींचती, मोड़ती,

जैसे कोई थका हुआ ज्योतिषी

बार-बार एक ही कुंडली सुधार रहा हो।


अब तो यह हाल है

कि मैं चेहरों में भविष्य ढूँढ़ता हूँ,

और भविष्य में

किसी पुराने डर का चेहरा।


कभी-कभी सचमुच लगता है

यह देश

किसी ग्रहण में फँसा हुआ है,

जहाँ प्रकाश भी

अपने होने का प्रमाण माँगता है।


और मैं

भीगता हुआ, काँपता हुआ,

हर रोज़ उसी आकाश के नीचे

एक नया अर्थ खोजता हूँ,


कि शायद

कुंडली से बाहर भी

कोई जीवन होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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