फिर वही सुबह, वही कमी
और फिर…
कहीं बहुत दूर, अँधेरे की तहों में
एक हल्की-सी रौशनी जन्म लेने लगती है
जैसे रात ने हार मान ली हो,
मगर दिल अब भी किसी जंग में उलझा हुआ हो।
नींद आई भी थी या नहीं,
ये समझ पाना अब मुश्किल हो गया है
क्योंकि ख़्वाब और हक़ीक़त के बीच की लकीर
तुम्हारी याद ने कब की मिटा दी है।
खिड़की के बाहर वही सुबह फिर खड़ी है,
मगर आज भी उसके हाथ खाली हैं
वो कोई नया एहसास नहीं लाई,
बस वही पुरानी कमी
और थोड़ा-सा और गहरा कर गई।
चाय की पहली चुस्की में
अब कोई ताज़गी नहीं मिलती,
बस एक अजीब-सी आदत निभाई जाती है
जैसे जीना भी अब किसी रस्म का हिस्सा हो गया हो।
ये जो वक़्त है न…
ये चलता तो रहता है,
मगर कुछ लम्हे ऐसे होते हैं
जो कभी पीछे नहीं छूटते
तुम उन्हीं में से एक हो।
हर नई सुबह
अब किसी नई शुरुआत की खबर नहीं देती,
बल्कि ये एहसास और पुख़्ता कर देती है
कि कुछ खाली जगहें
कभी भरी नहीं जातीं…
और मैं
उसी खालीपन के साथ
एक और दिन शुरू कर देता हूँ,
बिना ये जाने
कि ये सफ़र कहाँ खत्म होगा।
हर सुबह तेरी कमी और गहरी हो जाती है,
ज़िंदगी चलती है मगर अधूरी रह जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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