रात की आख़िरी पनाह
और फिर…
रात अपनी पूरी गहराई के साथ उतर आती है
जैसे आसमान ने सारे सवाल अपने दामन में छुपा लिए हों,
और ज़मीन ने हर जवाब से किनारा कर लिया हो।
कमरा अब और भी खामोश है,
घड़ी की टिक-टिक भी जैसे किसी अनकहे डर की तरह सुनाई देती है।
हर आवाज़, हर हलचल,
दिल के सन्नाटे को और साफ़ कर देती है।
तुम्हारी याद अब किसी लम्हे की मोहताज नहीं रही
वो अब रात की तरह हो गई है…
हर तरफ फैली हुई,
हर जगह मौजूद,
मगर फिर भी छूने से बहुत दूर।
तकिये पर सिर रखते ही
नींद नहीं, तुम चली आती हो
जैसे ख़्वाबों ने भी अब तुम्हारा ही रास्ता अपना लिया हो।
आँखें बंद करता हूँ,
तो तुम्हारी सूरत और साफ़ हो जाती है…
और खोलता हूँ,
तो दुनिया और भी खाली लगती है।
ये कैसी कैफ़ियत है
जहाँ होना और न होना
दोनों एक जैसे लगने लगे हैं।
रात अब पनाह नहीं देती,
बल्कि आईना बन गई है
जिसमें सिर्फ तुम्हारी कमी नज़र आती है,
और मेरा अधूरापन।
और इसी अधूरी रात के सीने में,
एक ख़ामोश-सी दुआ फिर से जन्म लेती है
शायद अगली सुबह,
कुछ कम दर्द लेकर आए…
रात की खामोशी में तेरा नाम उतर आता है,
नींद रूठ जाती है, दिल बस तुझे पाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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