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Saturday, 25 April 2026

शाम धीरे-धीरे उतरने लगती है

 और फिर…

शाम धीरे-धीरे उतरने लगती है

जैसे दिन ने अपनी सारी थकान समेटकर

खामोशी की चादर ओढ़ ली हो।


आसमान के रंग बदलते हैं,

नारंगी से स्याह तक का ये सफ़र

कुछ यूँ गुजरता है जैसे दिल के अंदर

उम्मीद से मायूसी तक का रास्ता।


परिंदे लौट रहे हैं अपने ठिकानों की तरफ,

हर एक को अपना घर याद आ गया है…

बस एक मैं हूँ—

जिसे अब भी समझ नहीं आता

कि लौटना कहाँ है।


तुम्हारी याद अब सिर्फ सुबह की ताजगी नहीं रही,

ना ही दोपहर की बेचैनी—

वो अब शाम की तरह हो गई है…

थोड़ी ठहरी हुई,

थोड़ी बुझी हुई,

मगर पूरी तरह खत्म कभी नहीं।


सड़क पर जलते हुए दीयों और लैंपपोस्ट की रोशनी

अब दिल को और खाली कर देती है—

क्योंकि हर उजाले के पीछे

तुम्हारी गैर-मौजूदगी और साफ़ दिखने लगती है।


और इस ढलती हुई रोशनी में,

दिल एक आख़िरी बार तुम्हें पुकारता है

बिना आवाज़ के,

बिना उम्मीद के,

सिर्फ एक आदत की तरह…

शाम ढली तो तेरी याद का साया गहरा हुआ,

दिन भर छुपा रहा जो, वो दर्द फिर चेहरा हुआ।

मुकेश ,,,,,,,,,

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