और फिर…
जब वही फूल दोपहर की धूप में थोड़ा-सा झुकने लगता है,
तो यूँ महसूस होता है जैसे तुम्हारी याद भी अब थकने लगी हो—
मगर अजीब बात है, ये थकान भी कम नहीं करती उसे,
बल्कि और गहरा, और सच्चा बना देती है।
हवा अब थोड़ी गर्म हो चली है,
उसमें सुबह वाली नर्मी नहीं रही—
फिर भी, कहीं न कहीं उसकी लहरों में तुम्हारे लम्स की परछाईं बाकी है।
मैं हाथ बढ़ाता हूँ…
मगर पकड़ में कुछ नहीं आता,
बस एक खाली-सा एहसास, जो देर तक उंगलियों में अटका रहता है।
दिन जैसे-जैसे आगे बढ़ता है,
लोगों की आवाज़ें, शहर का शोर,
सब कुछ मिलकर उस ख़ामोशी को ढकने की कोशिश करते हैं
जो तुम्हारे जाने के बाद मेरे अंदर घर कर गई है…
मगर सच्चाई ये है—
कि वो ख़ामोशी अब किसी आवाज़ से डरती नहीं,
वो अब मेरा हिस्सा बन चुकी है।
कभी-कभी लगता है,
तुम कोई याद नहीं…
बल्कि एक आदत हो,
जो हर मौसम, हर वक़्त, हर हाल में साथ रहती है—
चाहे मैं उसे चाहूँ या नहीं।
और फिर अचानक,
किसी मोड़ पर, किसी खामोश लम्हे में,
दिल ये मानने से इंकार कर देता है
कि तुम अब सिर्फ एक ख्याल हो…
दिन की रौशनी भी तेरे ग़म को छुपा न सकी,
दिल की वीरानी में तेरी आहट ही बसी रही।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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