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Saturday, 25 April 2026

जैसे हर पंखुड़ी में तुम्हारी मुस्कुराहट छुपी हो

 सुबह-सुबह जब कोई फूल खिला देखता हूँ, तुम्हारी याद आ जाती है

जैसे हर पंखुड़ी में तुम्हारी मुस्कुराहट छुपी हो, और हर खुशबू में तुम्हारा नाम घुला हुआ हो।

ओस की बूंदें जब फूलों पर ठहरी होती हैं, तो यूँ लगता है जैसे तुम्हारी आँखों की नमी ने रात भर उन्हें थामे रखा हो। हवा जब हल्के से गुजरती है, तो उन पत्तों का काँपना किसी अधूरे जुमले की तरह लगता है—जो तुमने कभी कहा नहीं, मगर मैंने हमेशा सुन लिया।

ये सुबह भी अजीब है…
हर रोज़ नई लगती है, मगर हर बार तुम्हारी तरफ ही ले जाती है।
जैसे वक़्त आगे बढ़ रहा हो, मगर दिल किसी एक ही लम्हे में ठहरा हुआ हो।

कभी-कभी सोचता हूँ—
क्या ये फूल सच में आज खिले हैं,
या ये वही एहसास हैं जो तुम्हारे साथ किसी सुबह में रह गए थे…
और अब हर दिन बस उनका ही दोहराव होता है।

फूल खिलते हैं तो तेरी खुशबू बिखर जाती है,

हर नई सुबह में जैसे तू ही उतर आती है।

और फिर…
जब वही फूल दोपहर की धूप में थोड़ा-सा झुकने लगता है,
तो यूँ महसूस होता है जैसे तुम्हारी याद भी अब थकने लगी हो—
मगर अजीब बात है, ये थकान भी कम नहीं करती उसे,
बल्कि और गहरा, और सच्चा बना देती है।

हवा अब थोड़ी गर्म हो चली है,
उसमें सुबह वाली नर्मी नहीं रही—
फिर भी, कहीं न कहीं उसकी लहरों में तुम्हारे लम्स की परछाईं बाकी है।
मैं हाथ बढ़ाता हूँ…
मगर पकड़ में कुछ नहीं आता,
बस एक खाली-सा एहसास, जो देर तक उंगलियों में अटका रहता है।

दिन जैसे-जैसे आगे बढ़ता है,
लोगों की आवाज़ें, शहर का शोर,
सब कुछ मिलकर उस ख़ामोशी को ढकने की कोशिश करते हैं
जो तुम्हारे जाने के बाद मेरे अंदर घर कर गई है…
मगर सच्चाई ये है—
कि वो ख़ामोशी अब किसी आवाज़ से डरती नहीं,
वो अब मेरा हिस्सा बन चुकी है।

कभी-कभी लगता है,
तुम कोई याद नहीं…
बल्कि एक आदत हो,
जो हर मौसम, हर वक़्त, हर हाल में साथ रहती है—
चाहे मैं उसे चाहूँ या नहीं।

और फिर अचानक,
किसी मोड़ पर, किसी खामोश लम्हे में,
दिल ये मानने से इंकार कर देता है
कि तुम अब सिर्फ एक ख्याल हो…

दिन की रौशनी भी तेरे ग़म को छुपा न सकी,

दिल की वीरानी में तेरी आहट ही बसी रही।

और फिर…

शाम धीरे-धीरे उतरने लगती है—
जैसे दिन ने अपनी सारी थकान समेटकर
खामोशी की चादर ओढ़ ली हो।

आसमान के रंग बदलते हैं,
नारंगी से स्याह तक का ये सफ़र
कुछ यूँ गुजरता है जैसे दिल के अंदर
उम्मीद से मायूसी तक का रास्ता।

परिंदे लौट रहे हैं अपने ठिकानों की तरफ,
हर एक को अपना घर याद आ गया है…
बस एक मैं हूँ—
जिसे अब भी समझ नहीं आता
कि लौटना कहाँ है।

तुम्हारी याद अब सिर्फ सुबह की ताजगी नहीं रही,
ना ही दोपहर की बेचैनी—
वो अब शाम की तरह हो गई है…
थोड़ी ठहरी हुई,
थोड़ी बुझी हुई,
मगर पूरी तरह खत्म कभी नहीं।

सड़क पर जलते हुए दीयों और लैंपपोस्ट की रोशनी
अब दिल को और खाली कर देती है—
क्योंकि हर उजाले के पीछे
तुम्हारी गैर-मौजूदगी और साफ़ दिखने लगती है।

और इस ढलती हुई रोशनी में,
दिल एक आख़िरी बार तुम्हें पुकारता है—
बिना आवाज़ के,
बिना उम्मीद के,
सिर्फ एक आदत की तरह…

शाम ढली तो तेरी याद का साया गहरा हुआ,

दिन भर छुपा रहा जो, वो दर्द फिर चेहरा हुआ।

रात की आख़िरी पनाह

और फिर…
रात अपनी पूरी गहराई के साथ उतर आती है—
जैसे आसमान ने सारे सवाल अपने दामन में छुपा लिए हों,
और ज़मीन ने हर जवाब से किनारा कर लिया हो।

कमरा अब और भी खामोश है,
घड़ी की टिक-टिक भी जैसे किसी अनकहे डर की तरह सुनाई देती है।
हर आवाज़, हर हलचल,
दिल के सन्नाटे को और साफ़ कर देती है।

तुम्हारी याद अब किसी लम्हे की मोहताज नहीं रही—
वो अब रात की तरह हो गई है…
हर तरफ फैली हुई,
हर जगह मौजूद,
मगर फिर भी छूने से बहुत दूर।

तकिये पर सिर रखते ही
नींद नहीं, तुम चली आती हो—
जैसे ख़्वाबों ने भी अब तुम्हारा ही रास्ता अपना लिया हो।
आँखें बंद करता हूँ,
तो तुम्हारी सूरत और साफ़ हो जाती है…
और खोलता हूँ,
तो दुनिया और भी खाली लगती है।

ये कैसी कैफ़ियत है—
जहाँ होना और न होना
दोनों एक जैसे लगने लगे हैं।

रात अब पनाह नहीं देती,
बल्कि आईना बन गई है—
जिसमें सिर्फ तुम्हारी कमी नज़र आती है,
और मेरा अधूरापन।

और इसी अधूरी रात के सीने में,
एक ख़ामोश-सी दुआ फिर से जन्म लेती है—
शायद अगली सुबह,
कुछ कम दर्द लेकर आए…

रात की खामोशी में तेरा नाम उतर आता है,

नींद रूठ जाती है, दिल बस तुझे पाता है।


फिर वही सुबह, वही कमी

और फिर…
कहीं बहुत दूर, अँधेरे की तहों में
एक हल्की-सी रौशनी जन्म लेने लगती है—
जैसे रात ने हार मान ली हो,
मगर दिल अब भी किसी जंग में उलझा हुआ हो।

नींद आई भी थी या नहीं,
ये समझ पाना अब मुश्किल हो गया है—
क्योंकि ख़्वाब और हक़ीक़त के बीच की लकीर
तुम्हारी याद ने कब की मिटा दी है।

खिड़की के बाहर वही सुबह फिर खड़ी है,
मगर आज भी उसके हाथ खाली हैं—
वो कोई नया एहसास नहीं लाई,
बस वही पुरानी कमी
और थोड़ा-सा और गहरा कर गई।

चाय की पहली चुस्की में
अब कोई ताज़गी नहीं मिलती,
बस एक अजीब-सी आदत निभाई जाती है—
जैसे जीना भी अब किसी रस्म का हिस्सा हो गया हो।

ये जो वक़्त है न…
ये चलता तो रहता है,
मगर कुछ लम्हे ऐसे होते हैं
जो कभी पीछे नहीं छूटते—
तुम उन्हीं में से एक हो।

हर नई सुबह
अब किसी नई शुरुआत की खबर नहीं देती,
बल्कि ये एहसास और पुख़्ता कर देती है
कि कुछ खाली जगहें
कभी भरी नहीं जातीं…

और मैं—
उसी खालीपन के साथ
एक और दिन शुरू कर देता हूँ,
बिना ये जाने
कि ये सफ़र कहाँ खत्म होगा।

हर सुबह तेरी कमी और गहरी हो जाती है,

ज़िंदगी चलती है मगर अधूरी रह जाती है।


Mukesh,,,,,,,,,,,,,,,,

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