तुम मेरी आदत बनती जा रही हो
तुम
धीरे-धीरे नहीं आई
तुम तो
चुपचाप उतर गईं
मेरे रोज़ के होने में,
जैसे साँस
बिना बताए
अपना हक़ ले लेती है।
अब
तुम्हें याद करना
कोई कोशिश नहीं रहा,
यह तो
वैसा ही है
जैसे सुबह आँख खुलते ही
रोशनी का होना।
तुम
किसी खास पल में नहीं,
हर छोटे-छोटे लम्हे में हो
चाय की पहली भाप में,
खाली कुर्सी के सन्नाटे में,
और उन शब्दों के बीच
जो मैं कह नहीं पाता।
मैंने कभी सोचा नहीं था
कि कोई
इतना साधारण होकर भी
इतना जरूरी हो सकता है
पर तुम
मेरी आदत बनती जा रही हो।
यह इश्क़
शोर नहीं करता,
कोई दावा नहीं करता
बस
धीरे-धीरे
मुझे मुझसे कम
और तुम्हें मुझमें ज़्यादा
करता जाता है।
अब
अगर एक दिन भी
तुम्हारा ख्याल न आए,
तो लगता है
कुछ अधूरा रह गया
जैसे कोई इबादत
बिना नीयत के पूरी हो गई हो।
तुम्हारा होना
अब कोई सवाल नहीं,
कोई उलझन नहीं
तुम
एक सहज-सी निरंतरता हो,
जो बिना वजह
चलती रहती है।
तुम मेरी आदत
नहीं बन रही
तुम
मेरे वजूद का हिस्सा
होती जा रही हो।
और शायद
सबसे गहरा इश्क़ वही होता है
जो आदत बनकर
रूह में बस जाए,
और
कभी छूटने का ख्याल भी
न आए।
मुकेश,,,,,,,
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