रूह के आईने में धुंधला सा तुम
रूह के आईने पर
कोई धूल नहीं थी,
फिर भी
तुम साफ़ दिखाई नहीं दिए
जैसे पहचान
इच्छा से नहीं,
इजाज़त से जन्म लेती हो।
मैंने बहुत चाहा
कि तुम्हें स्पष्ट देख लूँ
तुम्हारी आँखें,
तुम्हारा चेहरा,
तुम्हारी पूरी मौजूदगी
पर हर बार
तुम
बस एक आभास बनकर रह गए।
धुंधलापन
कमी नहीं था,
वह
तुम्हारा तरीका था
खुद को छुपाकर
और गहरा उतर जाने का।
मैंने आईना पोंछा नहीं,
क्योंकि समझ गया
जो साफ़ दिख जाए
वह अक्सर
ठहरता नहीं।
तुम्हारा होना
अब किसी रूप में नहीं,
किसी नाम में नहीं
तुम
एक हल्की-सी परत हो,
जो हर साफ़ तस्वीर के पीछे
धीरे-धीरे सांस लेती है।
जब भी
मैं खुद को देखने बैठता हूँ,
तुम
बीच में आ जाते हो
न पूरी तरह सामने,
न पूरी तरह ओझल
बस
इतना कि
मैं खुद को
पूरी तरह देख न पाऊँ।
और शायद
यही इश्क़ का सच है
कि
रूह के आईने में
कोई भी चेहरा
अकेला नहीं होता।
तुम
मेरे भीतर
धुंधले नहीं हो
तुम
उस स्पष्टता के पार हो
जहाँ
हर पहचान
मिटने लगती है।
रूह के आईने में
धुंधला सा तुम
कभी खोते नहीं
बस
हर बार
थोड़ा और
गहरा हो जाते हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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