होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 19 April 2026

मनुष्य के भीतर का शोर

 मनुष्य के भीतर का शोर

धीरे-धीरे भरता है

जैसे कुएँ में

अदृश्य पानी


बाहर सब शांत दिखता है

पेड़ स्थिर

आकाश निर्विकार


लेकिन भीतर

विचारों की भीड़

एक-दूसरे से टकराती रहती है


हम बोलते कम हैं

सोचते ज़्यादा

और सोचते भी ऐसे

जैसे हर विचार

अंतिम हो


यह शोर

कानों से नहीं सुनाई देता

यह

रगों में बहता है


नींद में

सपनों का रूप लेता है

और जागते में

बेचैनी का


जब यह शोर बढ़ता है

तो शब्द

अपनी जगह खो देते हैं


बातें

अधूरी रह जाती हैं

और रिश्ते

बिना कारण टूटने लगते हैं


एक मनुष्य के भीतर

जब बहुत शोर होता है

तो वह

बाहर की दुनिया से

धीरे-धीरे कटने लगता है


और तब


सृष्टि

उसके लिए

खामोश हो जाती है


नदियाँ बहती रहती हैं

पर उसे सुनाई नहीं देतीं

पत्ते हिलते हैं

पर उसमें कोई संगीत नहीं बचता


आकाश

फैला रहता है

पर उसमें कोई प्रश्न नहीं उठता


यह खामोशी

सुकून की नहीं होती


यह

एक ऐसे शोर की परिणति है

जो

इतना बढ़ गया है

कि सब कुछ

डुबो चुका है


लेकिन


अगर कभी

मनुष्य अपने भीतर

थोड़ी जगह बना ले


थोड़ा ठहर जाए

थोड़ा सुन ले


तो


उसी शोर के बीच

एक बहुत महीन ध्वनि

जन्म लेती है


और वही ध्वनि

धीरे-धीरे

सृष्टि को फिर से

बोलना सिखाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment