जब डर साँस लेता है
धीरे-धीरे
अंदर कहीं
सिमटने लगती हैं दिशाएँ
जैसे आकाश
अपने ही भीतर मुड़ रहा हो
हम डरते हैं
तो कदम छोटे हो जाते हैं
आवाज़ हल्की
और आँखें
खुले होते हुए भी
देखना छोड़ देती हैं
डर
कोई शोर नहीं करता
वह चुपचाप
रगों में उतरता है
और फिर
हमारे होने की जगह
थोड़ी-थोड़ी कम कर देता है
एक आदमी डरता है
तो उसका घर छोटा हो जाता है
एक शहर डरता है
तो उसकी गलियाँ खाली हो जाती हैं
और जब
मनुष्य डरता है
तो ब्रह्मांड
अपना विस्तार खोने लगता है
पेड़
हवा को कम पकड़ते हैं
नदियाँ
धीमे बहने लगती हैं
आकाश
अपनी ऊँचाई
किसी अदृश्य डर के आगे
झुका देता है
डर
दरअसल
हमारे भीतर का अँधेरा नहीं है
वह
हमारे भीतर की रोशनी का
पीछे हट जाना है
जब हम डरते हैं
तो हम
थोड़ा-थोड़ा कम हो जाते हैं
और जब हम
कम होते हैं
तो ब्रह्मांड भी
हमारे साथ
थोड़ा सिमट जाता है
लेकिन
कहीं न कहीं
एक बहुत सूक्ष्म जगह पर
एक साहस
अब भी साँस ले रहा होता है
और जैसे ही
वह एक साँस भरता है
ब्रह्मांड
फिर से
फैलने लगता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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