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Sunday, 19 April 2026

विद्या–कर्म समुच्चय की भ्रान्ति का कारण — फलभेद से निष्ठा-भेद का तात्त्विक निरूपण

विद्या–कर्म समुच्चय की भ्रान्ति का कारण — फलभेद से निष्ठा-भेद का तात्त्विक निरूपण

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

तत्र अवान्तर-फलम् इदं विद्या-कर्मणोः समुच्चय-कारणम् आह।

अन्यथा फलवत्-अफलयोः संनिहितयोः अङ्गाङ्गित्वम् इव स्यात् इति।

“अन्यदेव…” इति।


यहाँ (श्रुति में) विद्या और कर्म के छोटे (अवान्तर) फलों का उल्लेख उनके समुच्चय (मिलाने) की सम्भावना को दिखाने के लिए किया गया है।

अन्यथा, यदि एक का फल हो और दूसरे का न हो, तो दोनों के पास-पास होने पर वे अंग और अंगी (मुख्य और सहायक) के समान माने जा सकते हैं।

इसीलिए “अन्यदेव…” आदि कहकर उनका भेद बताया गया है।

यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के नवम मन्त्र के गूढ़ तात्पर्य को और स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य उस भ्रान्ति का विश्लेषण करते हैं, जिसके कारण कुछ लोग विद्या (उपासना) और कर्म (अविद्या) का समुच्चय (मिश्रण) मान लेते हैं।

प्रथम— “अवान्तर-फलम्”

यहाँ “अवान्तर फल” से अभिप्राय है,वे सी मित और मध्यवर्ती फल, जो

कर्म से (जैसे पितृलोक)

और विद्या से (जैसे देवलोक)

प्राप्त होते हैं।

अब शंकराचार्य कहते हैं, “इदं विद्या-कर्मणोः समुच्चय-कारणम्”

अर्थात्,

यही अवान्तर फल लोगों को यह भ्रम उत्पन्न करता है कि—

शायद विद्या और कर्म को मिलाकर (समुच्चय करके) एक साथ साधना करनी चाहिए।

क्योंकि दोनों ही किसी न किसी फल को प्रदान करते हैं।

अब वे इस भ्रान्ति का तर्क देते हैं “अन्यथा फलवत्-अफलयोः…”

यदि ऐसा न माना जाए (कि दोनों के अलग-अलग फल हैं),

तो यह मान लिया जाएगा कि

एक (कर्म) फलदायक है और दूसरा (विद्या) फलरहित।

तब दोनों के एक साथ होने पर

“अङ्गाङ्गित्वम् इव स्यात्”

अर्थात्—

उनका संबंध “अंग” और “अंगी” (part and whole) के रूप में मान लिया जाएगा।

जैसे—

यज्ञ में मंत्र, सामग्री आदि “अंग” होते हैं

और यज्ञ स्वयं “अंगी”


वैसे ही,

कर्म को मुख्य और विद्या को सहायक (या इसके विपरीत) मान लिया जाएगा।

यही है समुच्चयवाद की मूल भ्रान्ति।

अब शंकराचार्य इसका खण्डन करते हैं

“अन्यदेव…”

यह उपनिषद् का वचन है—

“अन्यदेव विद्यया, अन्यदाहुरविद्यया”

अर्थात्—

विद्या से कुछ और (फल) प्राप्त होता है,

और अविद्या (कर्म) से कुछ और।


यह स्पष्ट करता है कि

दोनों के फल भिन्न हैं,

अतः वे साधन भी भिन्न हैं,

और उनका समुच्चय उचित नहीं।


दार्शनिक निष्कर्ष

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित होता है—

जहाँ फलभेद है, वहाँ साधनभेद अनिवार्य है

जहाँ साधनभेद है, वहाँ अंग-अंगी संबंध नहीं हो सकता

और जहाँ अंग-अंगी संबंध नहीं, वहाँ समुच्चय असंगत है


अतः,

विद्या और कर्म को एक साथ मिलाकर मोक्ष का साधन मानना शास्त्रसम्मत नहीं है।


दृष्टांत

जैसे

यदि दो मार्ग दो भिन्न स्थानों की ओर जाते हों,

तो उन्हें मिलाकर चलना संभव नहीं;

उसी प्रकार, विद्या और कर्म के फल भिन्न होने से उनका समुच्चय असंभव है।


इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने यह स्पष्ट किया है कि विद्या और कर्म के अवान्तर फल ही उनके समुच्चय की भ्रान्ति का कारण बनते हैं। परंतु उपनिषद् “अन्यदेव…” कहकर उनके फलभेद को स्थापित करता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि वे परस्पर स्वतंत्र साधन हैं, न कि अंग-अंगी रूप में जुड़े हुए। इस प्रकार, समुच्चयवाद का खण्डन कर आत्मज्ञान की स्वतंत्रता को स्थापित किया गया है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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