होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 19 April 2026

देवता-विद्या की सीमाएँ — कर्मत्यागपूर्वक उपासना की गहनतम बन्धनावस्था (नवम मन्त्र का शांकरार्थ)

 देवता-विद्या की सीमाएँ — कर्मत्यागपूर्वक उपासना की गहनतम बन्धनावस्था (नवम मन्त्र का शांकरार्थ)

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

ततः तस्मात् अन्धात्मकात् तमसः भय इव बहुतरम् एव ते तमः प्रविशन्ति।

के? — कर्म हित्वा ये उ, ये तु विद्यायाम् एव (देवताज्ञाने एव) रताः, अभिरताः।

उस अज्ञानरूप अंधकार से भी मानो अधिक गहन अंधकार में वे प्रवेश करते हैं।

कौन? — जो कर्म को त्यागकर केवल देवता-ज्ञान (उपासना) में ही लगे रहते हैं।

यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के नवम मन्त्र के द्वितीय भाग का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म और आश्चर्यजनक कथन किया गया है

कि जो केवल “विद्या” (देवता-उपासना) में लगे रहते हैं, वे उससे भी अधिक अंधकार में जाते हैं।

प्रथम दृष्टि में यह विरोधाभासी प्रतीत होता है,

क्योंकि “विद्या” तो सामान्यतः प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है।

परंतु शंकराचार्य यहाँ “विद्या” को विशेष अर्थ में लेते हैं,

देवता-विषयक उपासना-ज्ञान, न कि परमात्मज्ञान।

अब वाक्य का विश्लेषण -“ततः तस्मात् अन्धात्मकात् तमसः…”

अर्थात्,

उस अज्ञानरूप अंधकार (जो केवल कर्म में रत लोगों की स्थिति है) से भी—

“भय इव बहुतरम् एव” मानो अधिक गहन, अधिक भयानक अंधकार।

यहाँ “भय इव” (जैसे भयावह) शब्द यह संकेत करता है कि यह स्थिति और भी अधिक सूक्ष्म बन्धन वाली है।

अब प्रश्न,

“के?” — कौन लोग इस गहन अंधकार में जाते हैं?

उत्तर—“कर्म हित्वा ये उ…”

अर्थात्— जो लोग कर्म को त्याग देते हैं, परंतु

“विद्यायाम् एव रताः”

केवल देवता-ज्ञान (उपासना) में ही लगे रहते हैं।

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है

क्यों अधिक अंधकार?

शंकराचार्य के अनुसार


कर्मनिष्ठ (अविद्या) व्यक्ति कम से कम शास्त्रसम्मत मार्ग पर है

वह यज्ञ, दान आदि करता है

और धीरे-धीरे चित्तशुद्धि प्राप्त कर सकता है

परंतु जो व्यक्ति,कर्म को छोड़ देता है

और केवल उपासना (देवता-ज्ञान) में ही रत रहता है

परंतु आत्मज्ञान तक नहीं पहुँचता

वह एक प्रकार के सूक्ष्म अहंकार में फँस जाता है।

उसे लगता है कि,“मैं ज्ञानी हूँ, मैं उपासक हूँ”

और यही अभिमान उसे और गहरे बन्धन में डाल देता है।

इसलिए कहा गया, “बहुतरम् तमः”

अधिक गहन अज्ञान।

यहाँ एक सूक्ष्म बिन्दु यह भी है कि,

उपासना में द्वैत (देवता और उपासक का भेद) बना रहता है,

जबकि आत्मज्ञान में यह भेद समाप्त हो जाता है।

अतः, यदि उपासना आत्मज्ञान की ओर न ले जाए,

तो वह भी एक प्रकार का बन्धन बन जाती है।

दृष्टांत, जैसे कोई व्यक्ति साधन को ही लक्ष्य मानकर वहीं रुक जाए,

तो वह लक्ष्य से और दूर हो जाता है;

उसी प्रकार, उपासना में रुक जाना आत्मज्ञान से दूर ले जाता है।

इस भाष्यांश में शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि जो लोग कर्म को त्यागकर केवल देवता-उपासना में ही रत रहते हैं, वे और भी गहन अज्ञान में पड़ जाते हैं। यह निन्दा उपासना के निषेध के लिए नहीं, बल्कि उसे आत्मज्ञान से भिन्न और सीमित बताने के लिए है। इस प्रकार, उपनिषद् का अभिप्राय यह है कि साधक को न कर्म में ही रुकना चाहिए, न उपासना में, बल्कि अंततः आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।


मुकेश',,,,,,,,

No comments:

Post a Comment