अविद्या (कर्म) की परिभाषा — अग्निहोत्रादि में आसक्ति और आत्मज्ञान-विरोध (नवम मन्त्र का शांकरार्थ)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
येऽविद्याम्—विद्याया अन्यां तां कर्म इत्यर्थः; कर्मणः विद्याविरोधित्वात्।
ताम् अविद्याम् अग्निहोत्रादि-लक्षणाम् एव केवलाम् उपासते, तत्पराः सन्तः अनुतिष्ठन्ति इत्यभिप्रायः।
यहाँ “अविद्या” का अर्थ है—विद्या (आत्मज्ञान) से भिन्न, अर्थात् कर्म।
क्योंकि कर्म, ज्ञान का विरोधी है।
उस अविद्या को, जो अग्निहोत्र आदि कर्मों के रूप में है, कुछ लोग ही परम मानकर उसी में लगे रहते हैं—यही अभिप्राय है।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के नवम मन्त्र के अत्यंत महत्वपूर्ण पद “अविद्या” की शांकर-व्याख्या प्रस्तुत करता है। यहाँ शंकराचार्य “अविद्या” को सामान्य अज्ञान न मानकर, विशेष रूप से कर्मरूप अविद्या के रूप में स्पष्ट करते हैं।
प्रथम—“येऽविद्याम्—विद्याया अन्याम्”
अर्थात् जो “विद्या” (आत्मज्ञान) से भिन्न है, वही यहाँ “अविद्या” है।
यह एक नकारात्मक परिभाषा है,
अर्थात् जो आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है, वह सब “अविद्या” के अंतर्गत आता है।
अब शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं “तां कर्म इत्यर्थः”
यहाँ “अविद्या” का सीधा अर्थ है—कर्म।
विशेषतः वैदिक कर्म—जैसे यज्ञ, अग्निहोत्र आदि।
क्यों?
“कर्मणः विद्याविरोधित्वात्”
यह एक अत्यंत गूढ़ और निर्णायक सिद्धांत है
कर्म और आत्मज्ञान परस्पर विरोधी हैं।
कर्म का आधार है
कर्ता (doer)
कर्म (action)
फल (result)
जबकि आत्मज्ञान में
कर्ता-भाव का लोप हो जाता है
द्वैत समाप्त हो जाता है
अतः दोनों की दृष्टि एक-दूसरे के विपरीत है।
अब आगे
“ताम् अविद्याम् अग्निहोत्रादि-लक्षणाम्”
यहाँ शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह अविद्या कोई सामान्य अज्ञान नहीं,
बल्कि विशिष्ट वैदिक कर्म हैं
जैसे
अग्निहोत्र
यज्ञ
दान आदि
ये सभी धर्मशास्त्र द्वारा विहित हैं, परंतु फिर भी “अविद्या” कहे गए हैं
क्योंकि ये आत्मज्ञान नहीं हैं।
अब महत्वपूर्ण बात “केवलाम् उपासते”
कुछ लोग इन कर्मों को ही सब कुछ मान लेते हैं
उन्हें लगता है कि यही अंतिम साध्य है,
इसी से मुक्ति मिल जाएगी।
इसी को कहा गया
“तत्पराः सन्तः” वे पूरी तरह इन्हीं में लगे रहते हैं।
और,
“अनुतिष्ठन्ति”
निरंतर उनका आचरण करते हैं।
यहाँ शंकराचार्य का अभिप्राय यह है कि, ऐसे लोग आत्मज्ञान की ओर नहीं बढ़ते,
बल्कि कर्म में ही सीमित रह जाते हैं।
इस प्रकार, यद्यपि वे धर्माचरण कर रहे हैं,
फिर भी वे अज्ञान के क्षेत्र में ही रहते हैं।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे कोई व्यक्ति साधन (means) को ही लक्ष्य (end) मान ले,
तो वह कभी लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता;
उसी प्रकार, कर्म को ही परम मानने वाला व्यक्ति आत्मज्ञान से वंचित रह जाता है।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य ने “अविद्या” को कर्म के रूप में स्पष्ट किया है, जो आत्मज्ञान से भिन्न और उसका विरोधी है। अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्म, यद्यपि शास्त्रसम्मत हैं, फिर भी वे आत्मज्ञान का स्थान नहीं ले सकते। जो लोग इन्हीं कर्मों को अंतिम साध्य मानकर उनमें ही लगे रहते हैं, वे आत्मतत्त्व से दूर रह जाते हैं। अतः यह मन्त्र साधक को कर्म से आगे बढ़कर आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment