अन्धं तमः प्रविशन्ति” — अविद्योपासक की गति (नवम मन्त्र का शांकरार्थ)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
तत्र— “अन्धं तमः” अज्ञानात्मकं तमः प्रविशन्ति।
के? — ये अविद्याम् उपासते।
यहाँ “अन्धं तमः” का अर्थ है—घोर अज्ञानरूप अंधकार।
उसमें कौन प्रवेश करते हैं? — जो अविद्या (कर्ममात्र) में लगे रहते हैं।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के नवम मन्त्र के प्रथम चरण की व्याख्या है, जहाँ “अन्धं तमः प्रविशन्ति” कहा गया है। शंकराचार्य यहाँ इस वाक्य के गूढ़ अर्थ को स्पष्ट करते हैं।
“अन्धं तमः”— यह केवल भौतिक अंधकार नहीं, बल्कि अज्ञान का प्रतीक है।
“अन्ध” शब्द से यह संकेत मिलता है कि यह अंधकार इतना गहरा है कि उसमें कोई विवेक, कोई प्रकाश शेष नहीं रहता।
शंकराचार्य इसे कहते हैं,“अदर्शनात्मकं तमः”—अर्थात् जहाँ सत्य का दर्शन नहीं होता, वही अज्ञान है।
अब प्रश्न उठता है,
“के?” — इसमें कौन प्रवेश करते हैं?
उत्तर है
“ये अविद्याम् उपासते”,
यहाँ “अविद्या” का अर्थ केवल सामान्य अज्ञान नहीं, बल्कि कर्मप्रधान जीवन है
जहाँ व्यक्ति केवल यज्ञ, दान, तप आदि कर्मों में लगा रहता है,
और आत्मज्ञान की ओर उन्मुख नहीं होता।
ऐसे लोग,बाह्य क्रियाओं में व्यस्त रहते हैं
परंतु आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते
इसलिए, यद्यपि वे धर्माचरण कर रहे होते हैं,
फिर भी वे अज्ञान के अंधकार में ही रहते हैं।
यहाँ एक सूक्ष्म बिन्दु समझना आवश्यक है
शंकराचार्य कर्म की निन्दा नहीं कर रहे,
बल्कि यह दिखा रहे हैं कि, यदि कर्म के साथ आत्मज्ञान न हो, तो वह अंतिम मुक्ति नहीं दे सकता।
अतः “अन्धं तमः” का अर्थ है, वह स्थिति जहाँ,
आत्मा का ज्ञान नहीं है
और व्यक्ति केवल बाह्य कर्मों में ही उलझा हुआ है
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
जैसे कोई व्यक्ति अंधेरे में चल रहा हो,
वह चलते तो रहता है, परंतु उसे दिशा का ज्ञान नहीं होता;
उसी प्रकार, कर्म में लगे हुए व्यक्ति भी चलते रहते हैं,
परंतु आत्मज्ञान के बिना वे लक्ष्य तक नहीं पहुँचते।
इस प्रकार, यह मन्त्र एक चेतावनी है
कि केवल कर्म में ही रत रहना पर्याप्त नहीं,
बल्कि आत्मज्ञान की ओर बढ़ना आवश्यक है।
“अन्धं तमः प्रविशन्ति” के माध्यम से शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि जो लोग केवल अविद्या (कर्म) में लगे रहते हैं, वे अज्ञानरूप अंधकार में ही रहते हैं। यह निन्दा कर्म का निषेध नहीं, बल्कि आत्मज्ञान के महत्व को स्थापित करने के लिए है। इस प्रकार, यह मन्त्र साधक को बाह्य कर्म से आगे बढ़कर आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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