ज्ञान–कर्म समुच्चय का खण्डन — पृथक् फलश्रुति से निष्ठा-भेद का शांकरार्थ (नवम मन्त्र)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
तयोः ज्ञान-कर्मणोः इह एकैक-अवस्थान-निन्दा समुच्चयाभिप्रायया, न तु निन्दापरैव।
एकैकस्य पृथक् फलश्रवणात्— “अविद्यया तद् आरोहन्ति”, “विद्यया देवलोकः”,
“न तत्र दक्षिणा यन्ति”, “कर्मणा पितृलोकः” इति।
न हि शास्त्रविहितं किञ्चित् अकर्तव्यताम् इयात्।
यहाँ ज्ञान और कर्म—इन दोनों में से किसी एक में ही स्थित रहने की जो निन्दा की गई है, वह वास्तव में उनके समुच्चय (मिलाने) के निषेध के लिए है, न कि केवल निन्दा करने के लिए।
क्योंकि दोनों के अलग-अलग फल बताए गए हैं—अविद्या (कर्म) से एक फल, विद्या से देवलोक, और कर्म से पितृलोक आदि।
इसलिए शास्त्र द्वारा विहित कोई भी कर्म निषिद्ध (त्याज्य) नहीं हो सकता।
यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के नवम मन्त्र के अत्यंत सूक्ष्म अर्थ को स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य यह दिखाते हैं कि उपनिषद् में जो “विद्या” और “अविद्या” की निन्दा प्रतीत होती है, उसका वास्तविक उद्देश्य क्या है।
प्रथम— “तयोः ज्ञान-कर्मणोः… एकैक-अवस्थान-निन्दा…”
यहाँ “ज्ञान” (विद्या) और “कर्म” (अविद्या) दोनों का उल्लेख है।
उपनिषद् में ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों की निन्दा की जा रही है
केवल कर्म में लगे रहने वालों की भी
और केवल विद्या (उपासना) में लगे रहने वालों की भी
अब शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं,
यह निन्दा वास्तव में “समुच्चयाभिप्रायया” है
अर्थात् ज्ञान और कर्म को मिलाने की प्रवृत्ति के निषेध के लिए।
यहाँ निन्दा का उद्देश्य यह नहीं कि
कर्म या उपासना व्यर्थ हैं,
बल्कि यह कि उन्हें परमात्मज्ञान के साथ मिलाकर मोक्ष का साधन नहीं माना जा सकता।
अब इसका प्रमाण दिया गया है,
“एकैकस्य पृथक् फलश्रवणात्”,
अर्थात्,
शास्त्र में प्रत्येक (ज्ञान और कर्म) के लिए अलग-अलग फल बताए गए हैं,
“अविद्यया तद् आरोहन्ति” — कर्म से (संसार या किसी लोक की प्राप्ति)
“विद्यया देवलोकः” — उपासना से देवलोक
“कर्मणा पितृलोकः” — कर्म से पितृलोक
“न तत्र दक्षिणा यन्ति” — कुछ लोकों में कर्म का प्रवेश नहीं
इन सभी वचनों से यह स्पष्ट होता है कि
ज्ञान (उपासना) और कर्म के फल भिन्न-भिन्न हैं।
यदि फल भिन्न हैं, तो साधन भी भिन्न होंगे
और उनका समुच्चय (मिलाना) तर्कसंगत नहीं है।
अब एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किया गया
“न हि शास्त्रविहितं किञ्चित् अकर्तव्यताम् इयात्”
अर्थात्,
शास्त्र द्वारा जो भी कर्म विहित (prescribed) हैं, वे त्याज्य नहीं हो सकते।
इसका अर्थ यह है कि,
शंकराचार्य कर्म का निषेध नहीं कर रहे,
बल्कि उसका सीमांकन (limitation) कर रहे हैं।
कर्म का स्थान है,
चित्तशुद्धि के लिए
योग्य साधक के निर्माण के लिए
परंतु मोक्ष का साधन केवल आत्मज्ञान है।
इस प्रकार,
कर्म को त्याज्य नहीं कहा गया
परंतु उसे मोक्ष का साधन भी नहीं माना गया
यही शंकराचार्य का संतुलित दृष्टिकोण है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है,
जैसे शिक्षा के प्रारम्भिक चरण (कक्षा) आवश्यक हैं, परंतु वे अंतिम लक्ष्य (ज्ञान) नहीं हैं;
उसी प्रकार, कर्म आवश्यक हो सकते हैं, परंतु वे मोक्ष का साधन नहीं।
इस भाष्यांश में शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान और कर्म की जो निन्दा उपनिषद् में की गई है, वह उनके समुच्चय के निषेध के लिए है, न कि उनके पूर्ण त्याग के लिए। पृथक् फलश्रुति के आधार पर यह सिद्ध होता है कि दोनों के मार्ग भिन्न हैं। कर्म शास्त्रसम्मत और उपयोगी है, परंतु मोक्ष का साधन केवल आत्मज्ञान है—यही अद्वैत वेदान्त का निष्कर्ष है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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