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Thursday, 2 April 2026

एक शराबी की डायरी

 एक शराबी की डायरी


दिन — पता नहीं कौन सा

सुबह

फिर देर से आँख खुली

सिर में जैसे

किसी ने रात भर

लोहे पीटे हों।


आईने में देखा

चेहरा मेरा था,

आँखें किसी और की।


दोपहर


कसम खाई

आज नहीं पिऊँगा।

कितनी बार खाई है

याद नहीं

पर हर बार

सच लगती है।


चाय पी

दो-चार काम किए

और

खुद को समझाया

देखो,

तुम ठीक हो रहे हो।


शाम


सूरज ढला

और

मन भी।


अंदर कहीं

एक खालीपन

हिलने लगा

जैसे

कोई पुकार रहा हो

नाम लेकर।


दोस्तों का फोन आया

“बस एक पेग…”

और

मैं हार गया

अपने ही सामने।


रात


पहला घूंट

हमेशा

सबसे सच्चा लगता है

जैसे

सारी तकलीफ़ें

धीरे-धीरे घुल रही हों।


दूसरे के बाद

दुनिया

थोड़ी नरम लगने लगती है।


तीसरे के बाद

मैं

खुद को

माफ़ करने लगता हूँ।


देर रात


अब

शब्द लड़खड़ा रहे हैं

और

यादें

सीधी चल रही हैं।


कुछ चेहरे

बार-बार आते हैं

कुछ बातें

जो कह नहीं पाया,

कुछ

जो कह दीं

और नहीं कहनी चाहिए थीं।


आधी रात के बाद


मैं

डायरी लिख रहा हूँ

या

डायरी

मुझे लिख रही है

पता नहीं।


बस इतना जानता हूँ

कि

हर रात

मैं थोड़ा-थोड़ा

खुद से दूर हो जाता हूँ।


अंतिम पंक्ति (शायद)


कल

फिर कसम खाऊँगा

आज नहीं पिऊँगा।


और

शायद

कल भी

यही लिखूँगा।


— एक आदमी

जो हर दिन

थोड़ा-थोड़ा

गुम हो रहा है।


मुकेश ,,,,,

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