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Sunday, 5 April 2026

तुम और नीम की छाँव में ठहरा हुआ वक़्त

 तुम और नीम की छाँव में ठहरा हुआ वक़्त


तुम…

ज़्यादा बोलती नहीं थीं,

पर जब भी होती थीं

लगता था

दिन थोड़ा धीमा हो गया है।


जैसे दोपहर

अचानक कहीं बैठ गई हो—

नीम के पेड़ के नीचे।


तुम्हारे मैसेज

बहुत छोटे होते थे

“आ गए?”

“खाना खाया?”

“गरमी बहुत है…”


बस इतना ही।


पर न जाने क्यों

इन तीन-चार शब्दों में

एक पूरा साया होता था,

जिसमें बैठ कर

थोड़ी देर

आराम किया जा सकता था।


तुम्हारी मौजूदगी…

नीम की छाँव जैसी थी


थोड़ी कड़वी,

थोड़ी सच्ची,

पर सुकून देती हुई।


तुम कभी मीठी बातें नहीं करती थीं,

न ही कोई बड़ी-बड़ी भावनाएँ

बस सीधे-सीधे

जैसा है वैसा।


एक दिन मैंने लिखा

“तुम बदल गई हो।”


तुमने जवाब दिया—

“नहीं, बस अब उतना रुकती नहीं…”


और उस “रुकती नहीं” में

कितना कुछ था

जो तुमने कहा नहीं।


धीरे-धीरे

तुम्हारे मैसेज कम हो गए।


नीम की छाँव

जैसे खिसकने लगी

दोपहर वही थी,

पर साया

अब कहीं और चला गया था।


मैं कभी-कभी

पुरानी चैट खोलकर बैठता हूँ,

जैसे कोई

पुराने पेड़ के नीचे

अपनी जगह ढूँढ रहा हो।


पर अब

वो सुकून नहीं मिलता

बस याद आती है 

कि कभी यहाँ

ठंडक थी।


तुम अब भी हो शायद,

कहीं न कहीं,

किसी और दोपहर में,

किसी और छाँव के साथ।


सोचता हूँ

मैसेज करूँ


“गरमी बहुत है…”


फिर लगता है

तुम जवाब दोगी—

“हम्म…”


और बात

वहीं खत्म हो जाएगी।


वैसे…

कुछ बातें

नीम की छाँव जैसी होती हैं

वक़्त के साथ

खुद ही आगे बढ़ जाती हैं,

और हम

वहीं बैठे रह जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

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