उसकी चुप्पी और आम के बौर
वो लड़की…
ज़्यादा कुछ नहीं कहती थी,
पर हर मौसम में
किसी न किसी तरह
मौजूद रहती थी।
फरवरी-मार्च के आसपास
उसकी याद
कुछ ज़्यादा आने लगती थी
शायद इसलिए कि
इन्हीं दिनों
आम के बौर आते हैं।
उसकी चुप्पी…
ठीक वैसी ही थी
जैसे आम के पेड़ पर
अचानक उग आए बौर,
बिना शोर,
बिना घोषणा।
दूर से देखो तो
कुछ खास नहीं,
पर पास जाओ
तो एक हल्की-सी गंध
पूरे मन में फैल जाती है।
वो ऑनलाइन रहती थी,
पर बात नहीं करती थी।
कभी-कभी
मेरे स्टेटस देख लेती थी
बस “seen”
और फिर
लंबी चुप्पी।
एक बार मैंने लिखा—
“तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?”
उसने जवाब दिया
“सब कहना ज़रूरी नहीं होता…”
और उस दिन
मुझे पहली बार लगा
कि चुप रहना भी
एक तरह की भाषा है।
उसकी चुप्पी में
कोई नाराज़गी नहीं थी,
न ही कोई साफ़ इनकार
बस एक अधूरा-सा
ठहराव,
जैसे बौर में छुपा हुआ
अधपका आम।
धीरे-धीरे
मैंने उसकी चुप्पी को
समझना शुरू किया
वो हर बार
कुछ कहती नहीं थी,
पर हर बार
कुछ छोड़ जाती थी
एक हल्की-सी महक,
एक अधूरी-सी बात,
एक ऐसा एहसास
जिसका नाम नहीं होता।
फिर एक दिन
वो बिल्कुल चुप हो गई।
न “seen”,
न ऑनलाइन,
न कोई आहट।
अब कभी-कभी
जब हवा में
आम के बौर की खुशबू आती है,
तो लगता है
वो कहीं पास ही है,
बस बोल नहीं रही।
सोचता हूँ
मैसेज करूँ
फिर याद आता है
उसका कहा हुआ वाक्य
“सब कहना ज़रूरी नहीं होता…”
वैसे…
शायद ठीक ही है।
कुछ चुप्पियाँ
आम के बौर जैसी होती हैं
जितना कम छुओ,
उतनी देर तक महकती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment