धीमे-धीमे गिरती तुम्हारी बातों की ओस
वो लड़की…
बहुत ज़्यादा नहीं बोलती थी
पर जो भी कहती थी
पूरा नहीं होता था कभी
जैसे आधा वाक्य
और बाकी
मेरे लिए छोड़ देती थी।
मेरे इनबॉक्स में
उसके मैसेज
कभी अचानक आ जाते थे
“आज ठंड है…”
“चाय पी?”
“अजीब-सा लग रहा है…”
बस इतना ही।
उसकी बातें…
धीरे-धीरे गिरती थीं
जैसे ओस,
जिसे गिरते हुए
कोई देख नहीं पाता
पर सुबह
सब कुछ भीगा हुआ मिलता है।
एक बार उसने लिखा—
“तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”
मैंने टाइप किया था बहुत कुछ,
डिलीट कर दिया।
फिर लिखा
“बस ऐसे ही…”
उसने रिप्लाई किया
“हम्म…”
और वहीं
पूरी बातचीत खत्म हो गई।
अजीब बात ये थी
कि उसकी छोटी-छोटी बातें
दिन भर साथ रहती थीं।
“खाना खा लिया?”
जैसा सवाल भी
किसी गहरी चिंता की तरह
दिल में टिक जाता था।
फिर एक दिन
उसने लिखना कम कर दिया।
मैसेज आते थे
पर और छोटे,
और हल्के,
जैसे ओस भी अब
ठहरने से डरती हो।
मैंने पूछा
“सब ठीक?”
उसने लिखा
“हाँ…”
और उस “हाँ” में
कुछ भी ठीक नहीं था।
धीरे-धीरे
उसकी बातें
गिरनी बंद हो गईं।
इनबॉक्स सूखा रहने लगा
जैसे कोई सुबह
ओस के बिना निकल आई हो।
अब कभी-कभी
पुराने चैट खोलता हूँ,
तो लगता है
किसी बीते मौसम की नमी
अब भी बची हुई है।
सोचता हूँ
फिर से लिखूँ—
“आज ठंड है…”
पर डर लगता है
कि कहीं जवाब में
सिर्फ़
“Seen”
न मिल जाए।
वैसे…
रहने ही देता हूँ।
ओस को
ज़बरदस्ती गिराया नहीं जाता।
मुकेश ,,,,,,,,
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