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Monday, 18 May 2026

एक रात मैंने सपना देखा - 2

 एक रात

मैंने सपना देखा

कि सारी किताबें
अचानक अपनी भाषाएँ भूल गई थीं।

पुस्तकालयों में
लाखों पन्ने थे,
मगर उन पर
कोई शब्द नहीं बचा था।

लोग
घबराकर एक-दूसरे से पूछ रहे थे 
“अब इतिहास कहाँ रहेगा?”

मगर इतिहास
पहले ही
मनुष्यों के चेहरों से मिट चुका था।

अंत में
सिर्फ़ एक बूढ़ा चित्रकार बचा था
जो किसी सुनसान संग्रहालय में
दीवार पर
एक दरवाज़ा बना रहा था।

बाहर
पूरा शहर जल रहा था,
और भीतर
वह आदमी
बहुत सावधानी से
दरवाज़े की कुंडी में
नीला रंग भर रहा था।

मैंने उससे पूछा —
“जब सब ख़त्म हो रहा है
तो तुम यह दरवाज़ा क्यों बना रहे हो?”

उसने ब्रश रोके बिना कहा 

“ताकि
अगर ईश्वर कभी लौटे
तो उसे भीतर आने का रास्ता मिले…”

फिर अचानक
संग्रहालय की सारी दीवारें
धीरे-धीरे पिघलने लगीं।

और आख़िर में
सिर्फ़ वही दरवाज़ा बचा रहा
जो कहीं खुलता नहीं था।

मुकेश

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