समय की स्लेट पे हवा के हस्ताक्षर
समय की स्लेट पे
किसने लिखे ये हल्के, मिटते हुए अक्षर
जैसे किसी ने छूकर भी
छुआ न हो।
हवा आई थी अभी-अभी,
अपने अदृश्य उँगलियों से
कुछ लिखकर चली गई
कोई नाम नहीं,
कोई दावा नहीं।
मैंने पढ़ना चाहा,
तो शब्द बिखर गए,
जैसे यादों का धुंधलका
आँखों से पहले ही थक जाए।
ये जो लकीरें हैं—
न पूरी रेखाएँ, न अधूरी,
बस संकेत हैं
कि कुछ था…
और अब नहीं है।
हवा के ये हस्ताक्षर
किसी दस्तावेज़ पर नहीं,
बस उस क्षण पर हैं
जो बीतते ही
अपना अर्थ खो देता है।
और समय—
वो तो बस एक चुपचाप अध्यापक है,
जो हर दिन
नई स्लेट देता है,
पर कभी नहीं बताता
कि पिछली लिखावट का क्या हुआ।
शायद जीवन भी
इन्हीं अदृश्य हस्ताक्षरों का संग्रह है
जहाँ हम सोचते हैं
कि हम लिख रहे हैं,
पर असल में
हवा ही हमें लिख रही होती है।
मुकेश्,,,
No comments:
Post a Comment