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Sunday, 17 May 2026

ईशावास्योपनिषद् का सप्तदश मंत्र : प्राण-उत्क्रमण, अग्नि-समर्पण एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन

 ईशावास्योपनिषद् का सप्तदश मंत्र : प्राण-उत्क्रमण, अग्नि-समर्पण एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन


मूल मंत्र (यथावत)

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्
क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर १७

मंत्र का हिंदी अनुवाद

प्राण (वायु) अमृतस्वरूप अनिल (सूक्ष्म वायु) में लीन हो जाए, और यह शरीर भस्म में परिणत हो जाए।
हे संकल्पशील मन! स्मरण कर, किए हुए कर्मों को स्मरण कर, स्मरण कर, किए हुए कर्मों को स्मरण कर।

 

शंकरभाष्य (संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)

अथेदानीं मम मरिष्यतः वायुः प्राणः अध्यात्मपरिच्छेदं हित्वा अधिदैवतात्मानं हे सर्वात्मकम् अनिलम् अमृतम् सूत्रात्मानं प्रतिपद्यताम् इति वाक्यशेषः।
लिङ् चेदं ज्ञानकर्मसंस्कृतम् उत्क्रामतु इति द्रष्टव्यम्। मार्गयाचनसामर्थ्यात्।
अथेदं शरीरम् अग्नौ हुतं भूयात्।
इति यथोपासनं प्रतीकात्मकत्वात् सत्यात्मकम् अग्न्याख्यं ब्रह्म अभेदेन उच्यते।
हे क्रतो! संकल्पात्मकः स्मर यत् मम स्मर्तव्यं तस्य कालः अधुना प्रत्युपस्थितः। अतः स्मर एतावन्तं कालं भावितं कृतम् अग्ने स्मर।
यत् मया बाल्यप्रभृति अनुष्ठितं कर्म तत् स्मर।
क्रतो स्मर कृतं स्मरइति पुनर्वचनम् आदरार्थम् १७

 

शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद (यथारूप)

अब यह कहा जा रहा है कि मरणासन्न व्यक्ति के लिए

मेरा प्राण वायु, जो अध्यात्म-सीमा से युक्त है, उसे छोड़कर अधिदैवत रूप सर्वव्यापक अनिल (सूत्रात्मा) को प्राप्त हो जाए।

यह वाक्य शेष है अर्थात् शरीर त्याग के समय का निर्देश है।

यहाँ लिङ्” (विधि रूप) इस अर्थ में है कि ज्ञान और कर्म से संस्कारित जीव शरीर से उत्क्रमण करे।

यह मार्गयाचना (गति की प्रार्थना) की क्षमता के कारण कहा गया है।

अब यह शरीर अग्नि में आहुति होकर भस्म हो जाए।

इस प्रकार उपासना का प्रतीक है और वह सत्यस्वरूप अग्नि-ब्रह्म के अभेद का द्योतक है।

हे संकल्पशील मन! स्मरण कर कि मुझे क्या स्मरण करना है, उसका समय अब गया है। अतः अब तक जो कुछ भी किया गया है उसे स्मरण कर।

और बाल्यकाल से लेकर अब तक जो कर्म किए गए हैं, उन्हें भी स्मरण कर।

क्रतो स्मर कृतं स्मर” — यह पुनः कथन आदर और गंभीरता के लिए किया गया है।

 

शोधपूर्ण निबंध

ईशावास्योपनिषद् के सप्तदश मंत्र में मृत्यु-स्मृति, प्राण-उत्क्रमण और शंकराचार्य की आत्मदृष्टि

ईशावास्योपनिषद् का सप्तदश मंत्र उपनिषद् दर्शन में मृत्यु के क्षण में होने वाली आत्मचेतना और अंतिम स्मरण की प्रक्रिया का अत्यन्त गूढ़ वर्णन प्रस्तुत करता है। यह मंत्र केवल मृत्यु का वर्णन नहीं करता, बल्कि जीवन के सम्पूर्ण कर्मों के अंतिम आत्मसमीक्षण की आध्यात्मिक अवस्था को प्रकट करता है।

आदि शंकराचार्य इस मंत्र को शरीर-त्याग के समय होने वाले आत्मबोध और प्राण-उत्क्रमण की प्रक्रिया के रूप में व्याख्यायित करते हैं।

प्राण और सूत्रात्मा का अर्थ

शंकराचार्य के अनुसार

· प्राण = जीवन शक्ति 

· अनिल = सूक्ष्म वायु / सूत्रात्मा 

· उत्क्रमण = शरीर से आत्मा का निर्गमन 

यह प्रक्रिया केवल भौतिक नहीं, बल्कि चेतना का सूक्ष्म रूपान्तरण है।

 भस्मान्तं शरीरम्का प्रतीक अर्थ

शरीर का भस्म होना यह दर्शाता है कि

· शरीर नश्वर है 

· केवल चेतना शाश्वत है 

· भौतिक अस्तित्व समाप्त होता है 

क्रतो स्मरका दार्शनिक अर्थ

क्रतुका अर्थ है संकल्प या कर्मबद्ध मन।

यहाँ यह निर्देश दिया गया है कि

· अंतिम क्षण में मन अपने संकल्पों और कर्मों को स्मरण करे 

· जीवन का संपूर्ण लेखा-जोखा चेतना में प्रकट हो 

अग्नि और का प्रतीकवाद

यहाँ केवल ध्वनि नहीं है, बल्कि

· ब्रह्म का प्रतीक 

· अग्नि का आध्यात्मिक स्वरूप 

· शुद्ध चेतना का प्रतिनिधि 

 

मृत्यु का अद्वैत दृष्टिकोण

शंकराचार्य के अनुसार मृत्यु

· आत्मा का नाश नहीं 

· केवल शरीर का परिवर्तन है 

· चेतना का उच्चतर स्तर में प्रवेश है 

अंतिम स्मृति और कर्मफल

यह मंत्र यह दर्शाता है कि

· जीवन के अंतिम क्षण में संपूर्ण कर्म चेतना में उपस्थित होते हैं 

· यही अगले अनुभव का आधार बनते हैं 

 

ईशावास्योपनिषद् का यह सप्तदश मंत्र जीवन और मृत्यु के बीच की सूक्ष्म चेतन प्रक्रिया को उद्घाटित करता है, जहाँ प्राण का उत्क्रमण और कर्म-स्मृति आत्मा की यात्रा को निर्धारित करते हैं।

आदि शंकराचार्य की दृष्टि में यह मंत्र यह स्पष्ट करता है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि आत्मा की चेतना-यात्रा का एक चरण है, जहाँ संपूर्ण जीवन एक अंतिम स्मृति में रूपांतरित हो जाता है।

इस प्रकार यह मंत्र उपनिषद् दर्शन में जीवन-मृत्यु के रहस्य का गहनतम आध्यात्मिक उद्घाटन करता है।

 

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