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Sunday, 10 May 2026

अब थकान भी

 अब थकान भी

सिर्फ जिस्म में नहीं उतरती
रूह तक चली जाती है।

कभी-कभी लगता है
मैं लोगों से नहीं,
अपनी ही आवाज़ से दूर हो गया हूँ।

बहुत कुछ बचाए रखा मैंने
मुस्कुराहटें, रिश्ते, उम्मीदें…
मगर सबसे ज़्यादा
खुद को खो दिया।

अब भीतर
एक लंबी ख़ामोशी रहती है,
जो रात भर
मुझसे बातें करती है।

और मैं…
हर सुबह
थोड़ा और अजनबी होकर उठता हूँ।

— मुकेश

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