कुछ यादें रूह पर लिखी जाती हैं
तेरे जाने को
बरसों गुज़र गए,
मगर कुछ लम्हे अब भी
मेरे भीतर
वैसे ही ताज़ा हैं
जैसे किसी बंद कमरे में
अटका हुआ इत्र।
वक़्त ने
बहुत-सी चीज़ें बदल दीं—
चेहरे, शहर, रिश्ते,
यहाँ तक कि
मेरी आवाज़ का लहजा भी।
मगर तेरी याद…
उसने उम्र बढ़ने से इंकार कर दिया।
कभी-कभी
कोई मामूली-सी चीज़
अचानक तेरा पता दे जाती है—
बारिश के बाद की हवा,
किसी अजनबी की हँसी,
या शाम के धुँधलके में
दूर बजती कोई अधूरी धुन।
और फिर
दिल के भीतर
एक पुराना दर खुलता है,
जहाँ अब भी
तेरी मौजूदगी की हल्की-सी रौशनी बाकी है।
मैंने कई दफ़ा
ख़ुद को समझाया
कि मोहब्बत का अंजाम
फ़क़्त फ़िराक़ होता है।
मगर सच यह है—
कुछ लोग
बिछड़कर भी
हमसे जुदा नहीं होते।
वे हमारी आदतों में उतर जाते हैं,
हमारी ख़ामोशियों में बस जाते हैं,
हमारी दुआओँ की तह में
धीरे-धीरे धड़कते रहते हैं।
तुझे याद करना अब
कोई हादसा नहीं रहा,
यह मेरी रूह की
एक पुरानी आदत बन चुका है।
जैसे कोई सूफ़ी
हर रात
अपने ही दिल के मजार पर
चिराग़ जलाने चला आता हो।
और अजीब बात यह है—
तेरी याद
मुझे तोड़ती भी है
और बचाए भी रखती है।
क्योंकि जिन लोगों ने
सच्ची मोहब्बत की होती है,
वे जानते हैं—
कुछ रिश्ते
निकाह, वादों या साथ से नहीं,
रूह की तहरीरों से बनते हैं।
उन्हें न वक़्त मिटा सकता है,
न फ़ासले।
वे बस
धीरे-धीरे
इंसान की पूरी ज़िंदगी में फैल जाते हैं।
— मुकेश
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