“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
बहुत शोर, बहुत रिश्ते, बहुत यात्राओं के बाद मनुष्य अंततः एकांत में लौटता है।
और वहीं धीरे-धीरे समझता है—
जिस सत्य को वह दुनिया भर में खोज रहा था, वह वर्षों से उसकी अपनी चुप्पी में बैठा था।
— मुकेश
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