रेत पर थक के गिरा हूँ तो हवा पूछती है
कौन दरिया था तेरा, कौन दिशा पूछती है
धूप ने छीन लिया मुझसे मेरे ख़्वाबों का रंग,
रात अब किस लिये आँखों में दिया पूछती है
मैंने चुपचाप कई दर्द समंदर को दिए,
अब मेरी प्यास का मुझसे ही पता पूछती है
एक मुद्दत से कोई लौट के आया ही नहीं,
राह हर मोड़ पे क़दमों का निशाँ पूछती है
मैंने मिट्टी की तरह ख़ुद को बिखरने भी दिया,
अब यही ख़ाक मेरी अपनी अना पूछती है
दिल के वीरान पड़े शहर में तन्हाई की धूप,
हर खुले दर से किसी नाम-सदा पूछती है
उम्र भर अपने ही साये से उलझता रहा मैं,
ज़िंदगी अब भी मेरी मुझसे दुआ पूछती है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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