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Monday, 18 May 2026

मुण्डक उपनिषद् - प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, छठा मंत्र

 मुण्डक उपनिषद् - प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, छठा  मंत्र

अक्षर-ब्रह्म का इन्द्रियातीत स्वरूप : मुण्डक उपनिषद् के षष्ठम मंत्र में पराविद्या, कारणता एवं अद्वैत चेतना का दार्शनिक विमर्श

मूल मंत्र (संस्कृत)

यत्तददृश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ।। ।।

अन्वय

यत् तत् अदृश्यम्, अग्राह्यम्, अगोत्रम्, अवर्णम्, अचक्षुः-श्रोत्रम्, अपाणि-पादम्, नित्यम्, विभुम्, सर्वगतम्, सुसूक्ष्मम्, अव्ययम्, यत् भूतयोनि (अस्ति), तत् धीराः परिपश्यन्ति।

संधि-विच्छेद

यत् + तत् + अदृश्यम् + अग्राह्यम् + अगोत्रम् + अवर्णम् + अचक्षुः + श्रोत्रम् + तत् + अपाणि + पादम्
नित्यम् + विभुम् + सर्वगतम् + सुसूक्ष्मम् + तत् + अव्ययम् + यत् + भूत + योनिम् + परि + पश्यन्ति + धीराः

पद-पदार्थ

यत्तददृश्यम् जो इन्द्रियों से देखा नहीं जा सकता; ब्रह्म दृश्य-सीमा से परे है। शंकराचार्य: इन्द्रियगोचरता का पूर्ण निषेध।

अग्राह्यम् जिसे पकड़ना संभव नहीं; कर्मेन्द्रिय एवं मन दोनों से अतीत।

अगोत्रम् किसी वंश, सीमा या कारण-श्रृंखला से असंबद्ध; अनादि सत्ता।

अवर्णम् गुण, रंग, रूप आदि से रहित; निरुपाधिक ब्रह्म।

अचक्षुःश्रोत्रम् जिसमें इन्द्रियाँ (देखना-सुनना) नहीं; परन्तु स्वयं चेतन-द्रष्टा।

अपाणिपादम् बिना हाथ-पैर; कर्म-कर्तृत्व से रहित शुद्ध सत्ता।

नित्यम् कालातीत, अविनाशी।

विभुम् सर्वव्यापी; सीमा रहित विस्तार।

सर्वगतम् समस्त अस्तित्व में व्याप्त।

सुसूक्ष्मम् अत्यन्त सूक्ष्म; स्थूल कारणों से रहित।

अव्ययम् जिसमें क्षय नहीं; रूपान्तरण से परे।

भूतयोनि समस्त भूतों का कारण; मूल कारण सत्ता।

भावार्थ

यह ब्रह्म देखा जा सकता है, पकड़ा जा सकता है। उसमें कोई वंश है, कोई रूप, इन्द्रियाँ। वह नित्य, सर्वव्यापी और अत्यन्त सूक्ष्म है। वही समस्त जगत का कारण होते हुए भी स्वयं अपरिवर्तनशील है। केवल वे ही धीर, विवेकी साधक उसे प्रत्यक्ष रूप से आत्मस्वरूप में अनुभव करते हैं।

शंकराचार्य भाष्य (यथावत् संस्कृत)

यथा 'विधिविषये कर्त्राद्यनेककारकोपसंहारद्वारेण सन मञ्ञ्चिचये कादमककारकोपसहारद्वारेण वाक्यार्थज्ञानकालादन्वत्रानुष्ठेयोऽर्थोऽस्त्यग्निहोत्रादिलक्षणो तथेह परविद्याविषये। वाक्यार्थज्ञानसमकाल एव तु पर्यवसितो भवति केवलशब्दप्रकाशितार्थज्ञानमात्र'निष्ठाव्यतिरिक्ताभावात् तस्मादिह परां विद्यां सविशेषणेनाक्षरेण विशिनष्टि- यत्तदद्रेश्यमित्यादिना 'वक्ष्यमाणं बुद्धौ संहत्य सिद्धवत्परामृश्यते-यत्तदिति 'अद्रेश्यमदृश्यं सर्वेषां बुद्धीन्द्रियाणामगम्यमित्येतत् दुशेर्बहिष्परवृत्तस्य पञ्चेन्द्रियद्वारकत्वात् आग्राह्रा कर्मेन्द्रियाविषयमित्येतत् अगोत्रं गोत्रमन्वयो मूलमित्यनर्थान्तरम् अगोत्रमनन्वयमित्यर्थः। हि तस्य मूलमस्ति येनान्वितं वर्ण्यन्त इति वर्णां द्रव्यधर्माः स्थूलत्वादयः शुक्लत्वादयो वा। अविद्यमाना वणी यस्य तदवर्णमक्षरम् अचक्षुःश्रोत्रे चक्षुश्ष श्रोत्रं नामरूपविषये करणे _ ` सर्वजन्तूनां ते अविद्यमाने यस्य तदचक्षुःश्रोत्रम् यः सर्वज्ञः सर्वविदित्यादिचेतनावत्त्वविशेषणत्वातपराप्तं संसारिणामिव चक्षुःश्रोत्रादिभिः करणैर*र्थंसाधकत्वं तदिश्रोत्रमिति वार्यते पश्यत्यचक्षुः श्रुणोत्यकर्ण:” इत्यादिदर्शनात किञ्च तदपाणिपादं कर्मेन्द्रियरहितमित्येतत् यत एवमग्राह्ममग्राहकं चातो नित्यमविनाशि। विभुं विविधं _ ब्रह्मादिस्थावरान्तप्राणिभेदैर्भवतीति विभुम् सर्वगतं व्यापकमाकाशवत्सुसूक्ष्मं शब्दादि-. स्थूलत्वकारणरहितत्वात् शब्दादयो ह्याकाशवाय्वादीनामुत्तरोत्तरं स्थूलत्वकारणानि तदभावात्सुसूक्ष्मम् किञ्च तदव्ययमुक्तधर्मत्वादेव व्येतीत्यव्ययम् 'ह्यनङ्गस्य *स्वाङ्ापचयलक्षणो व्ययः सम्भवति शरीरस्येव नापि कोशापचयलक्षणो व्ययः सम्भवति राज्ञ इव। नापि गुणद्वारको व्ययः सम्भवत्यगुणत्वात्सर्वात्मकत्वाच्च यदेवंलक्षणं भूतयोनिं भूतानां कारणं पृथिवीव स्थावरजङ्गमानां परिपश्यन्ति सर्वत आत्मभूतं सर्वस्याक्षरं पश्यन्ति धीरा धीमन्तो विवेकिनः। ईंद्दशमश्वर यया विद्ययाऽधिगम्यते सा परा विद्येति समुदायार्थः ।६।।

 

 

शंकर भाष्य का हिंदी अनुवाद

शंकराचार्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जैसे कर्मकाण्ड में अनेक क्रियाएँ होती हैं, वैसे परविद्या में वैसा कोई क्रम नहीं हैवाक्य के अर्थ का ज्ञान होते ही ब्रह्म का बोध पूर्ण हो जाता है। अदृश्यका अर्थ है जो किसी भी इन्द्रिय की पकड़ में नहीं आता। अग्राह्यवह है जिसे कर्मेन्द्रियाँ भी ग्रहण नहीं कर सकतीं। अगोत्रअर्थात जिसका कोई मूल या वंश नहीं, वह अनादि है। अवर्णवह है जिसमें कोई गुण, रूप या रंग नहीं। अचक्षुःश्रोत्रका अर्थ है कि उसमें इन्द्रियाँ नहीं, फिर भी वही सबका द्रष्टा-साक्षी है। अपाणिपादका अर्थ है कि वह कर्मेन्द्रियों से रहित है। वह नित्यम् और अविनाशी है। वह विभु और सर्वगत है, जैसे आकाश सर्वत्र है। वह अत्यन्त सूक्ष्म है क्योंकि उसमें स्थूलता के कारण नहीं हैं। वह अव्यय है क्योंकि उसमें किसी प्रकार का क्षय नहीं होता। वह भूतयोनि है, अर्थात समस्त जगत का कारण है। ऐसे ब्रह्म को ही धीर पुरुष आत्मरूप में सर्वत्र देखते हैं।

 

दार्शनिक विश्लेषण

अदृश्य ब्रह्म ज्ञान का विषय नहीं, अपितु चेतना का स्वरूप है।

इन्द्रिय सीमा इन्द्रियाँ केवल नाम-रूप पकड़ती हैं, सत्ता नहीं।

कारणता ब्रह्म कारण होते हुए भी कार्य में परिवर्तित नहीं होता।

सर्वगतता स्थानिक सीमा का निषेध।

अव्ययता समय में परिवर्तन का निषेध।

ज्ञान बनाम अनुभूति ज्ञान मानसिक है, अनुभूति अस्तित्वगत।

विषयगत व्याख्या

() प्रस्तावना यह मंत्र पराविद्या का चरम बिंदु है।

() इन्द्रियातीत ब्रह्म सभी संवेदी सीमाओं से परे सत्ता।

() सर्वव्यापक सत्ता नित्य और विभु चेतना।

() सूक्ष्मता कारणरहित मूल तत्त्व।

() शंकराचार्य दृष्टि माया के माध्यम से नाम-रूप की व्याख्या।

() भूतयोनि जगत का अद्वैत कारण।

() आधुनिक दृष्टि चेतना को सूचना-क्षेत्र (information field) की तरह देखा जाता है।

 

शोधात्मक निबंध 

यह मंत्र उपनिषदिक दर्शन का वह शिखर है जहाँ भाषा स्वयं अपने सीमा-रेखा का निषेध कर देती है। अदृश्यऔर अग्राह्यजैसे शब्द यह संकेत करते हैं कि ब्रह्म कोई वस्तु नहीं है, जिसे देखा या पकड़ा जा सके, बल्कि वह स्वयं देखने और पकड़ने की चेतना का आधार है।

शंकराचार्य के अनुसार, इन्द्रियाँ केवल नाम और रूप को ग्रहण करती हैं, परन्तु ब्रह्म नाम-रूप से परे है। इसलिए उसे जानने का अर्थ वस्तु-ज्ञान नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार है।

भूतयोनिके रूप में ब्रह्म कारण है, परन्तु वह लौकिक कारणों की तरह परिवर्तित नहीं होता। यह अद्वैत दृष्टि का केंद्रीय बिंदु हैकारण और कार्य का भेद केवल व्यवहारिक स्तर पर है, पारमार्थिक स्तर पर नहीं।

आधुनिक दर्शन और विज्ञान में चेतना को अब केवल मस्तिष्कीय उत्पाद नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे एक व्यापक सूचना-क्षेत्र (field of consciousness) के रूप में देखा जा रहा है। क्वांटम भौतिकी में भी अवलोकन (observation) और अस्तित्व (existence) के संबंध ने इस उपनिषदिक विचार को नई प्रासंगिकता दी है।

देखना बनाम जाननाका भेद यहाँ स्पष्ट होता हैदेखना इन्द्रिय क्रिया है, जबकि जानना आत्मसत्ता में स्थित होना है। ब्रह्म को जानना वस्तु को नहीं, स्वयं को जानना है।

इस प्रकार यह मंत्र हमें यह सिखाता है कि वास्तविक ज्ञान बाह्य जगत में नहीं, बल्कि उस चेतन आधार में है जिसमें सम्पूर्ण जगत प्रकट होता है और लीन होता है।


मुकेश # 9999678683 

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