उस आदमी ने पूरा जीवन घड़ियाँ ठीक कीं,

 उस आदमी ने

पूरा जीवन
घड़ियाँ ठीक कीं,

लेकिन अपनी एक भी सुबह
समय पर नहीं जी।

उसकी छोटी-सी दुकान में
हर समय
अलग-अलग वक़्त बजता रहता था।

एक घड़ी में
साढ़े पाँच,
दूसरी में
ग्यारह के दस,
कहीं कोई सुई अटकी हुई,
कहीं समय
बहुत तेज़ भागता हुआ।

वह बूढ़ा आदमी
आँख पर मोटा शीशा लगाकर
बहुत सावधानी से
टूटी हुई स्प्रिंगें जोड़ता था,
जैसे किसी मृत पक्षी की हड्डियाँ।

लोग आते,
अपनी बंद घड़ियाँ छोड़ जाते,
और लौटते समय
उन्हें फिर चलते हुए पाते।

लेकिन किसी ने नहीं देखा
कि धीरे-धीरे
उस आदमी के भीतर
समय रुकता जा रहा है।

एक दिन
दुकान खुली मिली,
कुर्सी खाली।

मेज़ पर
एक घड़ी रखी थी
जिसकी दोनों सुइयाँ
एक-दूसरे पर झुकी हुई थीं
जैसे थककर सो गई हों।

बाहर
बारिश हो रही थी।

दुकान की दीवार पर
टँगी सभी घड़ियाँ
अलग-अलग समय बता रही थीं,
सिर्फ़ एक को छोड़कर।

वह बन्द थी।

और अजीब बात —
उसी बन्द घड़ी में
सबसे गहरा सन्नाटा था।

— मुकेश

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