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Tuesday, 26 May 2026

आईने में बचा हुआ आदमी

 आईने में बचा हुआ आदमी

कुछ दिनों से
मैंने गौर किया है 

आईना
मुझे वैसा नहीं दिखाता
जैसा मैं हूँ।

वह
कुछ और भी दिखाता है।

सुबह दाढ़ी बनाते समय
जब चेहरा झुकाकर देखता हूँ,
तो कई बार लगता है
मेरे पीछे
कोई और खड़ा है।

कोई बहुत पुराना आदमी।

थका हुआ।
चुप।
जैसे बहुत वर्षों से
किसी बात का उत्तर सोच रहा हो।

पहले मैंने इसे
उम्र का भ्रम समझा।

फिर लगा
शायद अकेलापन
धीरे-धीरे आँखों के भीतर
अलग दृश्य बनाने लगता है।

लेकिन बात सिर्फ़ इतनी नहीं थी।

एक रात
मैं देर तक आईने के सामने बैठा रहा।

कमरे में
सिर्फ़ टेबल लैंप जल रहा था।

बाक़ी सब अँधेरा।

और तभी
मुझे पहली बार महसूस हुआ —

आईने में दिखने वाला चेहरा
हमेशा वर्तमान का नहीं होता।

उसमें
थोड़ा अतीत भी मिला रहता है।

थोड़ी थकान पिता की,
थोड़ी चुप्पी माँ की,
कुछ असफल प्रेम,
कुछ अपमान,
कुछ अधूरी इच्छाएँ।

मनुष्य अकेला चेहरा नहीं होता।

वह कई बीते हुए लोगों का
धीरे-धीरे बना हुआ मिश्रण होता है।

मैंने अपने माथे की झुर्रियों को देखा।

वे सिर्फ़ उम्र की रेखाएँ नहीं थीं।

उनमें
बहुत सारी अनकही बातें दबी थीं।

किसी नौकरी की चिंता।
किसी स्टेशन पर छूटी विदाई।
किसी ऐसे नाम की स्मृति
जिसे अब ज़ोर से नहीं लिया जाता।

और अचानक
मुझे लगा 

शायद इसी तरह
मनुष्य धीरे-धीरे
अपने माता-पिता में बदलने लगता है।

बिना जाने।

उनकी आदतें,
उनकी चुप्पियाँ,
यहाँ तक कि
दुख सहने का उनका तरीका भी
हमारे भीतर आ बसता है।

मैं देर तक
आईने को देखता रहा।

फिर एक क्षण ऐसा आया
जब मुझे लगा
आईने में खड़ा आदमी
मुझसे कुछ कहना चाहता है।

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

सिर्फ़ देखा।

बहुत देर तक।

उस नज़र में
एक अजीब थकान थी —
और उससे भी गहरी
एक स्वीकृति।

जैसे वह जानता हो
जीवन अंततः
समझने की नहीं,
ढोने की चीज़ है।

बाहर रात बहुत शांत थी।

कहीं दूर
एक ट्रेन की आवाज़ आई।

मैंने लैंप बुझा दिया।

अँधेरे में
आईना दिखाई नहीं दे रहा था,
लेकिन पता नहीं क्यों
मुझे लगातार महसूस होता रहा 

वह आदमी
अब भी वहीं खड़ा है।

चुपचाप।

मेरे लौटने की प्रतीक्षा में।

— मुकेश

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