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Tuesday, 12 May 2026

मोहब्बत कभी पूरी तरह ख़त्म नहीं होती

 मोहब्बत कभी पूरी तरह ख़त्म नहीं होती

बहुत अरसा हुआ
मैंने तेरे नाम को
ज़ोर से पुकारना छोड़ दिया है।

अब मैं
तेरा ज़िक्र भी
धीरे से करता हूँ,
जैसे कोई बुज़ुर्ग
पुरानी तस्बीह के दानों को
एहतियात से छूता है।

मगर सच यह है—
कुछ मोहब्बतें
आवाज़ खो देती हैं,
अस्तित्व नहीं।

वे भीतर
धीमे-धीमे जलती रहती हैं,
ठीक उस चिराग़ की तरह
जिसे कोई देख नहीं पाता
मगर जिसकी लौ
रूह को रोशन रखती है।

तेरे बाद
मैंने ज़िंदगी को
बहुत क़रीब से देखा।

लोग मिले,
रिश्ते बने,
कुछ चेहरे बहुत देर तक साथ भी रहे,
मगर दिल के एक हिस्से में
हमेशा एक ख़ाली मकान रहा
जिस पर सिर्फ़ तेरा नाम लिखा था।

कभी-कभी सोचता हूँ—
अगर तू लौट भी आए
तो क्या हम
वही लोग रह पाएँगे?

शायद नहीं।

वक़्त इंसान की आवाज़ ही नहीं,
उसकी रूह के मौसम भी बदल देता है।

मगर फिर भी
तेरी याद का असर
आज तक वैसा ही है।

आज भी
किसी उदास शाम में
जब हवा
हल्के से पर्दा हिलाती है,
मुझे लगता है
तू यहीं कहीं है—
बहुत पास,
मगर दिखाई नहीं देती।

मैंने अब
मोहब्बत से शिकायत करना छोड़ दिया है।

क्योंकि जो दर्द
रूह को गहरा कर दे,
वह बददुआ नहीं होता।

कुछ लोग
हमारी तक़दीर में
मिलने के लिए नहीं लिखे जाते,
वे सिर्फ़
हमें अधूरा छोड़कर
हमारी तलाश को मुकम्मल करने आते हैं।

और शायद
इसी का नाम इश्क़ है—

एक ऐसी रौशनी
जो बिछड़ने के बाद भी
दिल के किसी कोने में
उम्र भर जलती रहती है।

— मुकेश

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