धूल, बैले और बन्द खिड़कियाँ
धूल,
बैले और बन्द खिड़कियाँ
(Olga Khokhlova और
Pablo Picasso से
प्रेरित एक काल्पनिक मनोवैज्ञानिक कथा)
अब उसकी सबसे स्पष्ट
स्मृति उसके चलने का
ढंग है।
वह कमरे में प्रवेश
करती थी तो लगता
था, उसके पैरों के
नीचे अब भी कोई
अदृश्य संगीत बज रहा है।
शायद नर्तकियाँ कभी पूरी तरह
साधारण चाल नहीं चल
पातीं। उनके भीतर लय
शरीर से अलग होकर
भी बची रहती है।
जब चित्रकार उससे मिला, युद्ध
अभी यूरोप के ऊपर पूरी
तरह नहीं टूटा था,
लेकिन उसकी आहट हवा
में थी। बड़े शहरों
की शामों में बेचैनी बढ़ने
लगी थी। लोग अब
भी कैफ़े जाते थे, संगीत
सुनते थे, प्रेम करते
थे — लेकिन हर चीज़ के
भीतर एक हल्का असुरक्षित
कम्पन था।
वह रूसी बैले-समूह
के साथ आई थी।
उसका चेहरा अत्यन्त सुंदर नहीं था, लेकिन
उसमें अनुशासन था। आँखों में
ऐसी नियंत्रित दूरी, जैसी उन लोगों
में होती है जिन्होंने
अपने शरीर को वर्षों
तक कठोर अभ्यास में
ढाला हो।
चित्रकार
उस समय अपनी पूर्ववर्ती
उग्रता से कुछ दूर
जा चुका था। उसके
भीतर अब प्रसिद्धि का
विस्तार शुरू हो रहा
था। लोग उसे केवल
कलाकार नहीं, एक घटना की
तरह देखने लगे थे।
लेकिन
प्रसिद्धि मनुष्य को स्थिर नहीं
करती। कई बार वह
उसके भीतर और अधिक
अस्थिरता भर देती है।
पहली
बार जब वे साथ
बैठे, उसने देखा कि
वह स्त्री बहुत कम बोलती
है। लेकिन उसकी चुप्पी असहज
नहीं थी। उसमें सामाजिक
प्रशिक्षण था — जैसे उसने
अपने भावों को सार्वजनिक होने
से रोकना सीख लिया हो।
चित्रकार
ने उससे पूछा —
“तुम हमेशा इतनी सीधी बैठती
हो?”
वह हल्का मुस्कुराई।
“बैले
में झुकने की भी एक
मर्यादा होती है।”
उस उत्तर के बाद चित्रकार
बहुत देर तक उसे
देखता रहा।
शायद
पहली बार उसे किसी
स्त्री में आकृति से
अधिक संरचना दिखाई दी।
धीरे-धीरे उनका सम्बन्ध
गहरा हुआ। फिर विवाह।
कुछ
समय तक उनका घर
लगभग सामान्य लगा। भोजन की
मेज़, मित्रों का आना-जाना,
संगीत, यात्राएँ। उन दिनों चित्रकार
के चित्र भी बदलने लगे।
पहले की टूटन कुछ
समय के लिए कम
हो गई। आकृतियों में
शास्त्रीय संतुलन लौट आया।
लोगों
ने कहा —
विवाह ने उसे स्थिर
कर दिया है।
लेकिन
कलाकारों के भीतर स्थिरता
बहुत देर तक नहीं
टिकती।
धीरे-धीरे घर में
अदृश्य तनाव भरने लगा।
वह स्त्री व्यवस्था चाहती थी
नियमित जीवन,
सामाजिक सम्मान,
परिवार।
चित्रकार
इससे घबराने लगा।
उसे
लगा, दीवारें धीरे-धीरे उसके
चारों ओर सख़्त हो
रही हैं।
वह देर तक स्टूडियो
में रहने लगा। रातें
बाहर बीतने लगीं। चित्रों में फिर परिवर्तन
आने लगा। चेहरे टूटने
लगे। आँखें असमान होने लगीं। रेखाएँ
कठोर हो गईं।
एक शाम उसने उससे
कहा
“तुम पहले जैसे चित्र
नहीं बनाते।”
चित्रकार
ने पूछा
“कैसे?”
“पहले
उनमें भूख थी। अब
उनमें बेचैनी है।”
कमरे
में चुप्पी उतर आई।
बाहर
बारिश हो रही थी।
खिड़की के शीशे पर
पानी की पतली धारियाँ
बह रही थीं। वह
स्त्री पियानो के पास बैठी
थी। चित्रकार कमरे में चक्कर
लगा रहा था।
उसे
अचानक लगा
विवाह दो लोगों के
बीच नहीं,
दो अलग-अलग समयों
के बीच हो रहा
है।
स्त्री
भविष्य चाहती थी।
पुरुष वर्तमान से भी भागना
चाहता था।
धीरे-धीरे उनके बीच
दूरी बढ़ती गई। लेकिन सबसे
दुखद बात यह थी
कि दूरी शोर से
नहीं आई। वह धीरे-धीरे आई — आदत
की तरह। वे साथ
बैठते, लेकिन अलग सोचते। साथ
यात्रा करते, लेकिन भीतर अलग-अलग
दिशाओं में चलते रहते।
चित्रकार
अब उसे ध्यान से
कम देखने लगा था।
और शायद किसी सम्बन्ध
की वास्तविक मृत्यु वहीं शुरू होती
है
जब एक व्यक्ति दूसरे
को देखना बंद कर देता
है।
वह स्त्री आईने के सामने
देर तक खड़ी रहने
लगी। उसे लगता, उसका
चेहरा बदल रहा है।
नहीं — चेहरा नहीं, उसकी उपस्थिति। जैसे
वह धीरे-धीरे किसी
ऐसे घर में पारदर्शी
होती जा रही हो
जहाँ कभी वह केन्द्र
थी।
एक रात उसने उससे
पूछा
“क्या तुम कभी एक
ही जीवन से संतुष्ट
रह सकते हो?”
चित्रकार
हँसा नहीं।
“कलाकारों
के भीतर हमेशा दूसरा
कमरा खुला रहता है।”
उस उत्तर के बाद वह
बहुत देर तक चुप
रही।
उसे
समझ में आ गया ,
वह आदमी किसी एक
सम्बन्ध में पूरी तरह
निवास नहीं कर सकता।
उसके भीतर हमेशा एक
भाग बाहर की ओर
देखता रहेगा।
समय
बीतता गया।
उनके
बीच औपचारिकता बची रही, निकटता
नहीं।
चित्रकार
के जीवन में दूसरी
स्त्रियाँ आने लगीं। और
धीरे-धीरे वह स्त्री
अपने ही विवाह में
एक पुरानी वस्तु की तरह रहने
लगी — उपस्थित, लेकिन अनदेखी।
लेकिन
विचित्र बात यह है
कि बाद के वर्षों
में जब चित्रकार ने
उसके चित्र बनाए, उनमें करुणा बढ़ गई।
शायद
दूरी के बाद कलाकार
पहली बार मनुष्य को
देख पाता है।
अब जब उसके चित्रों
को देखता हूँ — सधे हुए चेहरे,
गम्भीर आँखें, बैठी हुई स्त्री
की कठोर शान्ति — तो
लगता है, उनमें केवल
विवाह नहीं है। उनमें
एक ऐसी स्त्री की
धीमी उदासी भी है जिसने
प्रेम को सामाजिक रूप
देने की कोशिश की,
लेकिन एक ऐसे आदमी
से प्रेम कर बैठी जिसके
भीतर कोई भी रूप
अधिक देर स्थिर नहीं
रह सकता था।
पूर्वपीठिका
और परिचय
Olga Khokhlova (1891–1955) रूसी
बैले-नर्तकी थीं और Pablo Picasso की
पहली पत्नी बनीं। उनकी मुलाक़ात प्रसिद्ध
बैले-समूह Ballets Russes के माध्यम से
हुई।
ओल्गा
के साथ सम्बन्ध के
दौरान पिकासो की कला में
उल्लेखनीय परिवर्तन आया। उनकी पूर्ववर्ती
उग्र आधुनिक शैली कुछ समय
के लिए अधिक शास्त्रीय
और संतुलित हुई। यह काल
उनके “Neoclassical
Phase” से भी जुड़ा माना
जाता है।
लेकिन
समय के साथ उनका
वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण हो
गया। ओल्गा सामाजिक स्थिरता और पारिवारिक संरचना
चाहती थीं, जबकि पिकासो
का स्वभाव निरन्तर परिवर्तनशील और भावनात्मक रूप
से अस्थिर था।
उनके
सम्बन्ध के टूटने के
बाद पिकासो की कला फिर
अधिक विखंडित और मनोवैज्ञानिक रूप
से तीखी हो गई।
यह कथा उसी मनोवैज्ञानिक
तनाव पर केन्द्रित है:
क्या एक अत्यन्त स्वतंत्र,
अस्थिर कलाकार और संरचना-प्रिय,
अनुशासित व्यक्ति एक साझा जीवन
बना सकते हैं?
ओल्गा
पिकासो के जीवन की
केवल एक प्रेमिका नहीं
थीं। वे उस सम्भावना
का प्रतीक थीं जिसमें कला
और घरेलू जीवन एक-दूसरे
को संतुलित कर सकते थे
— लेकिन शायद बहुत देर
तक नहीं।
मुकेश ,,,,,,,
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