जूतों की धूल - (Anton Chekhov और Nirmal Verma की सूक्ष्म यथार्थवादी संवेदना से प्रेरित शैली में)
शहर का बस अड्डा हमेशा उसे किसी अस्थायी जीवन की तरह लगता था।
वहाँ कोई स्थायी नहीं होता था
न यात्री, न आवाज़ें, न गन्धें।
सिर्फ़ प्रतीक्षा स्थायी थी।
सुबह के साढ़े नौ बजे थे। सर्दियों की धूप अभी पूरी तरह खुली नहीं थी। चाय की दुकानों से धुआँ उठ रहा था और गीली मिट्टी पर जूतों के निशान जगह-जगह बने हुए थे। रात में हल्की बारिश हुई थी, इसलिए बस अड्डे की टूटी हुई ज़मीन पर पानी छोटे-छोटे गड्ढों में जमा था।
रघुवीर हमेशा की तरह चाय की दुकान के कोने में बैठा था।
उसके सामने एल्यूमिनियम का गिलास रखा था, जिसमें चाय अब ठंडी होने लगी थी।
वह लोगों के चेहरे नहीं देखता था।
उसकी नज़र हमेशा नीचे रहती थी।
जूते।
सिर्फ़ जूते।
किसी के चमकते हुए काले जूते देखकर वह समझ जाता — आदमी नया अफ़सर है, अभी दुनिया ने उसे थकाया नहीं है।
एड़ी से घिसी चप्पलें उसे अक्सर उन औरतों की याद दिलातीं जो दिन भर घर और बाज़ार के बीच चलती रहती हैं।
धूल से सने स्पोर्ट्स शूज़ — बेचैन लड़के।
बहुत साफ़ लेकिन पुराने जूते — वे लोग जो अपनी गरीबी को आदत और अनुशासन से ढँकते हैं।
उसे यह आदत कब लगी, वह ठीक से नहीं जानता था।
शायद बचपन से।
उसके पिता मोची थे।
सड़क किनारे बैठकर जूते सीते थे।
रघुवीर घंटों उनके पास बैठा रहता।
पिता अक्सर कहते
“चेहरे झूठ बोल लेते हैं, पैर नहीं बोलते।”
तब वह इस बात का अर्थ नहीं समझता था।
अब समझता था।
मनुष्य का असली जीवन उसके चलने में प्रकट होता है।
कोई आदमी कितना भागा है, कितना रुका है, कितना झिझका है, कितना टूटा है — यह उसके जूतों में उतर आता है।
उस दिन भी वह उसी तरह लोगों को देख रहा था।
एक बूढ़ा आदमी फटी हुई रबर की चप्पलों में धीरे-धीरे चल रहा था। उसकी चाल में एक प्रकार की हार थी।
एक लड़की सफ़ेद जूतों में थी जिन पर बहुत सावधानी से कपड़ा मारा गया था — शायद किसी इंटरव्यू के लिए जा रही थी।
एक पुलिसवाले के भारी बूट थे, लेकिन एड़ियाँ भीतर की तरफ़ झुकी हुई थीं; रघुवीर ने सोचा — आदमी भीतर से डरपोक होगा।
फिर लगभग ग्यारह बजे
वह आदमी बस अड्डे पर आया।
साधारण-सा आदमी।
भूरी जैकेट।
दाढ़ी दो-तीन दिन पुरानी।
हाथ में छोटा बैग।
लेकिन रघुवीर की नज़र जैसे ही उसके जूतों पर पड़ी, वह अनायास सीधा होकर बैठ गया।
जूते भूरे रंग के थे। महँगे नहीं।
लेकिन उनकी घिसावट अजीब थी।
दाएँ पैर की नोक बुरी तरह छिली हुई थी, जैसे आदमी चलते समय बार-बार ज़मीन से टकराता हो।
बाएँ जूते की एड़ी तिरछी घिसी थी — अत्यधिक थकान या असंतुलन का संकेत।
लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि दोनों जूतों पर सूखी मिट्टी के छोटे-छोटे धब्बे थे, जैसे आदमी किसी ऐसे स्थान से आया हो जहाँ मिट्टी नम थी और उसने बहुत देर तक एक ही जगह खड़े होकर पैर रगड़े हों।
रघुवीर को अचानक बेचैनी हुई।
उसे लगा
इन जूतों में कोई सामान्य थकान नहीं है।
यह उस आदमी की चाल नहीं, उसका भीतर घिसा हुआ है।
वह आदमी पास की बेंच पर बैठ गया।
उसने चाय मँगाई।
रघुवीर लगातार उसके जूतों को देखता रहा।
और तभी उसके भीतर एक पुरानी स्मृति चमकी।
ठीक ऐसे ही जूते उसने वर्षों पहले देखे थे
अपने छोटे भाई के पैरों में।
उस दिन भी उसका भाई घर से सामान्य ढंग से निकला था।
रात को उसकी लाश रेलवे लाइन के पास मिली थी।
आत्महत्या।
कई वर्षों बाद भी रघुवीर को उसके जूतों की घिसावट याद थी।
चलने की नहीं — हार मानने की घिसावट।
उसके हाथ काँप गए।
उसने पहली बार उस आदमी का चेहरा देखने की कोशिश की।
चेहरा बिल्कुल साधारण था।
थका हुआ, लेकिन शांत।
ऐसे चेहरे रोज़ दिखाई देते हैं।
लेकिन जूते शांत नहीं थे।
वे जैसे लगातार कोई अदृश्य वाक्य दोहरा रहे थे।
रघुवीर अचानक उठकर उसके पास चला गया।
“कहाँ जाएँगे?” उसने बिना भूमिका के पूछा।
आदमी ने हल्की हैरानी से देखा।
“इलाहाबाद।”
“वहाँ कोई काम है?”
आदमी मुस्कुराया।
“हाँ… शायद आख़िरी काम।”
यह कहते समय उसने नीचे देखा।
रघुवीर के भीतर कुछ ठंडा-सा उतर गया।
बस अड्डे का शोर अचानक बहुत दूर लगने लगा।
चाय वाले की आवाज़, कुलियों की पुकार, बसों के हॉर्न — सब जैसे धुँधले हो गए।
सिर्फ़ वे जूते स्पष्ट थे।
उसे लगा जैसे वे धीरे-धीरे मृत्यु की तरफ़ चल रहे हैं।
वह आदमी चाय पीता रहा।
फिर बहुत सामान्य स्वर में बोला
“कभी-कभी आदमी थक जाता है।”
रघुवीर कुछ नहीं बोला।
उसने पहली बार महसूस किया कि कुछ जूतों की मरम्मत नहीं हो सकती।
क्योंकि घिसावट चमड़े में नहीं, जीवन में आ चुकी होती है।
बस आने लगी।
लोग उठने लगे।
आदमी ने अपना बैग उठाया।
रघुवीर बहुत देर तक उसके जूतों को भीड़ में दूर जाते देखता रहा।
फिर अचानक उसे लगा
इस दुनिया में सबसे भयावह चीज़ मृत्यु नहीं है।
सबसे भयावह है वह क्षण
जब मनुष्य भीतर ही भीतर चलना बंद कर देता है,
लेकिन उसके पैर अब भी आदत से चलते रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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