कुछ रास्ते तुम्हें बुलाते नहीं,
फिर भी तुम मुड़ जाते हो उनकी ओर
जैसे किसी अनजानी स्मृति ने
अंदर से नाम लिया हो तुम्हारा।
कुछ दरवाज़े
खटखटाने से पहले ही खुल जाते हैं,
और भीतर
कोई नहीं होता
सिवाय तुम्हारी अपनी आहट के।
तुम एक खाली कमरे में
धीरे से कुछ कहते हो,
और दीवारें
उसे संभालकर
वापस लौटा देती हैं
थोड़ा बदलकर,
थोड़ा गहरा करके।
यही लौटना
शायद सबसे सच्चा मिलना है,
जहाँ कोई दूसरा नहीं,
फिर भी संवाद पूरा हो जाता है।
अब जीवन भी
कुछ ऐसा ही कमरा है
जहाँ हम पुकारते हैं,
और जो लौटकर आता है
वही हमारा अपना होता है।
सुनो,
जो तुम्हें वापस मिलता है
वक़्त की इस खामोशी में
वो सिर्फ़ गूँज नहीं,
वो तुम्हारा ही प्रेम है
जो घूमकर
तुम तक आ पहुँचा है।
मुकेश ,,,,,
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